भाजपा ने की बागी उम्मीदवारों पर कार्यवाई, पार्टी नेता व पदाधिकारी पर दिखा रही मेहरबानी

बागी उम्मीदवारों के चुनाव मैदान में होने से मतदाता में बनी असमंजस की स्थिति 

मुंबई ।। महाराष्ट्र में होनेवाले विधानसभा चुनाव को लेकर शिवसेना - भाजपा ने गठबंधन तो कर लिया है परंतु अबकी पार्टी के आलाकमान के फैसले को पार्टी के कुछ नेता नही माने और उन्होंने अपक्ष उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरकर पार्टी के इस निर्णय को ठेंगा दिखा दिया है यह हालात सिर्फ युति में ही नही वरन कांग्रेस - एनसीपी में भी देखने को मिल रहा है सीटो के बटवारे में किये गए गए उलट फेर के कारण पार्टियों में बागी नेताओ की झड़ी सी लग गयी है परंतु वरिष्ठ नेताओ द्वारा उन बागी उम्मीदवारों पर तो कार्यवाई कर दी गयी लेकिन अभी तक उनका समर्थन करनेवाले कार्यकर्ताओ व नेताओ पर किसी भी प्रकार की कार्यवाई नही की गई पार्टी के इस निर्णय से लोगो मे असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि वे किसे अधिकृत उम्मीदवार माने और किसे अपना अमूल्य मत दे ।

बता दें कि भाजपा-शिवसेना के करीब 30 साल पुराने गठबंधन में पहली बार शिवसेना को भाजपा से कम सीटों पर लड़ना पड़ रहा है। राजग गठबंधन में शामिल शिवसेना 124 तथा भाजपा चार अन्य दलों के साथ 164 सीटों पर लड़ रही है। चार अन्य दलों में रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आ) को छह, मराठा नेता विनायक मेटे के शिव संग्राम पक्ष को चार, सांसद राजू शेट्टी से अलग होकर रैयत क्रांति संगठन बनाने वाले सदाभाऊ खोत को चार और महादेव जानकर के राष्ट्रीय समाज पक्ष को दो सीटें हासिल हुई हैं। शेष 148 सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है।भाजपा के चार साथी दलों में से राष्ट्रीय समाज पक्ष को छोड़कर शेष तीनों दल इस बार भाजपा के चुनाव चिह्न कमल पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा का मानना है कि इससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति नहीं बनेगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि का लाभ इन साथी दलों के उम्मीदवारों को भी होगा। भाजपा इन दलों के साथ मिलकर शिवसेना के बगैर भी सत्ता पाने लायक जादुई आंकड़ा, यानी 145 सीट जीतने में कामयाब हो सकती है।

भाजपा इस बार विधानसभा की 288 में से कम से कम 225 सीटों पर जीत हासिल करने की रणनीति बना रही है  इससे पहले भाजपा-शिवसेना गठबंधन में शिवसेना ऐसी 50 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ती थी, जिनपर वह कभी जीत नहीं पाई थी। 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ऐसी ही सीटें शिवसेना से लेने या उनकी अदलाबदली करने की मांग कर रही थी, लेकिन शिवसेना 169 सीटों से नीचे आने को तैयार नहीं थी।इस बार सीटों का बंटवारा करते समय इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि कहां, किस दल की पकड़ की मजबूत है। इसी के तहत सीटों की अदला बदली कर दी गयी परंतु यह अदला बदली कही कही दोनो पार्टियों के लिए तकलीफदेह बन गयी है सीटे बदलने से युति व आघाडी दोनो में इच्छुक उम्मीदवारों में तहलका मच गया और वे अपने पार्टी के आलाकमान के फैसले के खिलाफ जाकर चुनाव लड़ रहे है हैरत की बात तो यह है कि पार्टी के आलाकमान की तरफ से अभी तक ऐसे पदाधिकारियो पर कोई भी कार्यवाई नही की गई है और ना ही किसी भी तरह का फरमान जारी किया गया है जिससे यह तो प्रतीत होता है कि सीटो के बटवारे को लेकर युति व आघाडी में कही ना कही मलाल जरूर है ।

शिवसेना - भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों के सामने उनके ही पार्टी के बागी उम्मीदवार 

पार्टी के लिए उनके ही पदाधिकारी व कार्यकर्ता मुश्किल बनकर आ खड़े हुए है पार्टी ने आपसी तालमेल बैठाकर सीटों का बटवारा तो कर लिया परंतु इस बटवारे में कुछ सीटे ऐसी भी निकली जिसमे या तो भाजपा का कब्जा था या फिर शिवसेना का कब्जा था ऐसी सीटों को लेकर वहां के विद्यमान विधायक व इच्छुक उम्मीदवारों में निराशा फैल गया और उन्होंने पार्टी के आलाकमान के फैसले को ठेंगा दिखाकर अपक्ष उम्मीदवार के रूप में पर्चा भर दिया वरिष्ठों द्वारा उनपर नामांकन वापस लेने का भी दबाव बनाया गया परन्तु उन्होंने अपना नामांकन वापस नही लिया अंततः भाजपा पार्टी ने उन बागी उम्मीदवारों को पार्टी ने निष्काषित करने की कार्यवाई तो कर दी परंतु बाकी के कार्यकर्ता, पदाधिकारी व नेताओ को उनका काम करने से नही रोक पा रही है आज पार्टी के यही नेता व पदाधिकारी खुलेआम बागी उम्मीदवार का चुनाव प्रचार करते हुए देखे जा रहे है और पार्टी आलाकमान इन सब से अनजान अपनी आंखें मूंदे बैठी है ।

कांग्रेस अभी तक क्यो बैठी है खामोश ?

यही हालात कांग्रेस- एनसीपी के आघाडी की बनी हुई है यहां पर भी पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के सामने बागी उम्मीदवार आ खड़े हुए है और उनके साथ उनके ही पार्टी के नेता व पदाधिकारी जुटे हुए है वे खुलकर बागी उम्मीदवारों के प्रचार में लगे हुए है पर हैरत की बात तो यह है कि अभी तक पार्टी के आलाकमान की तरफ से इनको कोई भी नोटिस नही दिया गया है और यह लोग बेधड़क बागी उम्मीदवारों के प्रचार में जुटे हुए है इस चुनाव की एक खासबात यह भी है कि भाजपा - शिवसेना पार्टी का एक पदाधिकारी पूर्व की जगह पश्चिम में बागी उम्मीदवार के प्रचार में खुलकर सामने आ रहा है उनका यह कहना होता है कि हम तो अपने ही पार्टी का प्रचार कर रहे है इस बार की राजनीति ने सबकी जड़े हिलाकर रख दी है इस नए उलटफेर में आघाडी को फायदा होने की भी बाते की जा रही है खैर सभी उम्मीदवारों का प्रचार प्रसार जोरो पर है किसकी जीत होगी किसकी हार यह तो चुनाव नतीजे आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएंगे ।

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