ओबीसी एससी एसटी के साथ भेदभाव होता है लौटनराम निषाद

भदोही ।।आरक्षण ख़त्म नहीं, निष्प्रभावी  89 सचिवों में सिर्फ़ एक एससी तीन एसटी ओबीसी एक भी नहीं   लखनऊ देश में आरक्षण लागू होने की स्थिति कितनी ख़राब है, इसकी रिपोर्टें सरकारी आँकड़े ही साफ़-साफ़ बयान करते हैं। इस मामले में केंद्र सरकार के ऊँचे पदों पर तो स्थिति और भी ख़राब है  हाल ही में 10 जुलाई को एक रिपोर्ट आयी थी कि केंद्र सरकार में 89 सचिवों में से अनुसूचित जाति(एससी) के सिर्फ़ एक और अनुसूचित जनजाति (एसटी) से तीन सचिव हैं अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से कोई भी सचिव नहीं है। ये आँकड़े हाल ही में संसद में रखे गए थे। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार इसमें से अधिकतर सचिव भारतीय प्रशासनिक सेवा  आईएएस हैं

मंडल आयोग की सिफ़ारिश पर सरकारी नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 फ़ीसदी, एससी के लिए 15 फ़ीसदी और एसटी के लिए 7.5 फ़ीसदी आरक्षण लागू करना ज़रूरी है। लेकिन जब सचिव स्तर के इन पदों पर नियुक्ति के मामले में आरक्षण सही से लागू हुआ नहीं जान पड़ता है।आरक्षण की व्यवस्था होने के बाद भी उसे निष्प्रभावी कर दिया गया है

         केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों में एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व अतिरिक्त सचिव के स्तर पर भी ऐसा ही है। 93 अतिरिक्त सचिवों में से एससी के 6 और एसटी के 5 हैं। अतिरिक्त सचिवों में भी कोई ओबीसी श्रेणी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। 275 संयुक्त सचिवों में से 13 ( 4.73 फ़ीसदी) एससी हैं, 9 (3.27 फ़ीसदी) एसटी और 75 की जगह मात्र 19 ओबीसी श्रेणी से हैं

योगी का आरक्षण: जनरल से ज़्यादा अंक वाले ओबीसी कट-ऑफ़ मेरिट में नहीं

       आरक्षण जिस अनुपात में होना चाहिए वैसा नहीं होने पर इस पर सवाल उठते रहे हैं। आरक्षण सही तरीक़े से लागू नहीं किए जाने के ख़िलाफ़ विपक्षी नेता समय-समय पर आवाज़ उठाते रहते हैं। संसद में भी सवाल पूछे गए। ‘द प्रिंट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब सरकार ने  कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय द्वारा तैयार इन आँकड़ों को संसद में रखा था तब तृणमूल सांसद दिबयेंदु अधिकारी के सवाल का कार्मिक मंत्रालय के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 10 जुलाई को जवाब दिया था। उन्होंने कहा था कि आरक्षण श्रेणी से आने वाले अक्सर ज़्यादा उम्र में सेवा में आते हैं, इसलिए अधिकतर अधिकारी सचिव और अतिरिक्त सचिव जैसे पदों के लिए इम्पैनलमेंट किए जाने से पहले ही वे सेवानिवृत्त हो जाते हैं।मंत्री ने साफ़ कहा था, "इसी कारण भारत सरकार में उच्च पदों पर उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व तुलनात्मक रूप से कम है। हालाँकि, उनके नामों पर विचार के लिए उपलब्ध आरक्षित श्रेणी के अधिकारियों में से, उन्हें जितना संभव हो उतना ज़्यादा प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया जाता है

        अब राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह की बात कितनी सही है, यह तो इस पर कोई रिपोर्ट आए तभी पता चलेगा, लेकिन दूसरे ऐसे मामले हैं जहाँ उम्र ज़्यादा होने से असर नहीं पड़ना चाहिए और फिर भी एससी, एसटी और ओबीसी का प्रतिनिधित्व काफ़ी कम है

यह है केंद्रीय विश्वविद्यालयों में नियुक्ति का मामला-95.2 फ़ीसदी सवर्ण प्राध्यापक

      हाल ही में एक अंग्रेजी अख़बार को सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में इन सवालों के जवाब सामने आए। देश में कुल 40 केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं, जिसमें कुल  11,486 अध्यापन कार्य मे लगे कार्मिक हैं।1,125 प्राध्यापकों में  39 अनुसूचित जाति के प्राध्यापक है जिनका प्रतिनिधित्व  3.47 फ़ीसदी है, जो कि 15 फ़ीसदी होने चाहिए थे। अनुसूचित जनजाति 6 यानी 0.7 फ़ीसदी जो कि 7.5 फ़ीसदी होने चाहिए थे। पिछड़े वर्ग के प्राध्यापकों का प्रतिनिधित्व 0 है,जो 27 फ़ीसदी होने चाहिए थे। जबकि सवर्ण प्राध्यापक 1071 यानी 95.2 फ़ीसदी हैं जो हर हाल में 50 फ़ीसदी से अधिक नहीं होने चाहिये

      40 केंद्रीय संस्थानों में कुल 2620 असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। इसमें 130 (4.96 फ़ीसदी) अनुसूचित जाति के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं जो कि 393 होने चाहिए थे। 34 (1.3 फ़ीसदी) अनुसूचित जनजाति प्रोफ़ेसर हैं जो 197 होने चाहिए थे। इसके उलट कुल 3434 ( 92.9 फ़ीसदी) सवर्ण असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, जो 50 फ़ीसदी से ज्यादा हैं। पूरे देश में एक भी पिछड़े वर्ग का असोसिएट प्रोफ़ेसर केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में नहीं है

ओबीसी,एससी, एसटी के साथ भेदभाव होता है-लौटनराम निषाद

 राष्ट्रीय निषाद संघ के राष्ट्रीय सचिव व सामाजिक न्याय चिन्तक ने आरोप लगाया है कि अक्सर ओबीसी, एससी,एसटी वर्ग से संबंधित अधिकारियों को उन्हें शीर्ष पद तक पहुँचने नहीं दिया जाता है। ‘द प्रिंट’ के अनुसार, लौटनराम निषाद ने कहा-  कांग्रेस व भाजपा दोनों का ओबीसी,एससी,एसटी के लिए समान नजरिया है।दोनों आरएसएस की मंशानुसार की कम करते हैं।ओबीसी के साथ काफी भेदभाव किया जाता है।प्रधानमंत्री जी अपने को पिछड़ी जाति का बताते रहे हैं,पर इनके पीएम बनने के बाद तो ओबीसी की और दुर्दशा हो रही है। 11 अक्टूबर,2013 को मोदी जी ने कोच्चि स्थित माता अमृतानंदमयी देवी जी के आश्रम में कहे थे-मैं पिछड़ी जाति का हूँ और राजनीति में बहुतों के लिए अछूत हूँ, लेकिन अगले 10 वर्ष पिछ्डों दलितों का होगा।पर,ओबीसी को तो हर स्तर पर कुंद किया जा रहा,ओबीसी आरक्षण निष्प्रभावी किया जा रहा है।यही नहीं मेरिट या श्रेष्ठता सूची को भी दरकिनार कर 49.5% के दायरे में सीमित कर प्रत्यक्ष रूप से 10% व परोक्ष रूप से सवर्ण जातियों को 40.5% आरक्षण दे दिया गया है।

  मोदी सरकार ने निजी क्षेत्रों से 9 संयुक्त सचिवों की नियुक्ति कर संघ लोक सेवा आयोग पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया गया।सरकार के इस निर्णय से संघ लोक सेवा आयोग पर मंडरा रहा है।सरकारी नौकरियों में आरक्षण को कैसे ख़त्म किया जा सकता है, इसकी मिसाल देखनी है तो केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव के 9 पदों पर नियुक्ति प्रक्रिया को देखिए। संयुक्त सचिव के 9 पदों पर नियुक्तियों के मामले में यूपीएससी ने तो साफ़ शब्दों में कहा है कि डीओपीटी ने कहा था कि इस भर्ती मामले में कोई आरक्षण नहीं होगा

     एक आरटीआई से मिली जानकारी से पता चला है कि इस साल अप्रैल में संयुक्त सचिव स्तर पर निजी क्षेत्र से प्रतिभाओं को शामिल करने के दौरान कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने एक ऐसी प्रक्रिया अपनाई जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को आरक्षण देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। डीओपीटी के सामने आरटीआई दायर की गई थी और इसने जो जवाब दिया है उसी आधार पर अंग्रेज़ी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इसी साल जून में इस पर एक रिपोर्ट छापी थी।बता दें कि डीओपीटी ने 15 मई 2018 को एक परिपत्र में ज़िक्र किया था कि ‘केंद्र सरकार के पदों और सेवाओं के लिए नियुक्तियों के संबंध में एससी, एसटी और ओबीसी के उम्मीदवारों के लिए 45 दिनों या उससे अधिक के लिए होने वाली अस्थायी नियुक्तियों में भी आरक्षण होगा।’ये ख़बरें इस लिहाज़ से काफ़ी अहम हैं कि सरकार प्रवेश स्तर पर ही सिविल सेवाओं के बाहर से लोगों को नौकरी पर रखने की महत्त्वाकांक्षी योजना बना रही है। तो क्या यह योजना आरक्षण की व्यवस्था को निष्क्रिय करने जैसी नहीं होगी

रिपोर्टर

संबंधित पोस्ट