भिवंडी मनपा चुनाव में वंशवाद की हवा, नए चेहरों की एंट्री की तैयारी

भिवंडी। आगामी भिवंडी महानगरपालिका चुनाव में इस बार वंशवाद का रंग गहराने की संभावना जताई जा रही है। शहर की कई सीटों पर पिछले 15 से 35 वर्षों से एक ही परिवार का कब्जा कायम है। अब उन्हीं परिवारों की नई पीढ़ी राजनीति में किस्मत आजमाने और सत्ता का स्वाद चखने के लिए मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है,राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस बार चुनाव में ‘वंशवाद’ अहम मुद्दा बन सकता है।भिवंडी की राजनीति में इस बार दलों के अंदरूनी मतभेद भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसे प्रमुख दल दो-दो गुटों में बंट चुके हैं, जिससे अपक्ष उम्मीदवारों की संख्या में कमी आने की संभावना है। समाजवादी पार्टी भी अभी वर्तमान में दो खेमे में बंटा हुआ है। 

गौरतलब हो कि वर्ष 2017 के भिवंडी मनपा चुनाव में कांग्रेस 47 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। भाजपा को 19, शिवसेना को 12, कोणार्क विकास आघाडी को 4, समाजवादी पार्टी को 2, आरपीआई (एकतावादी) को 4 सीटें मिली थीं, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। दो अपक्ष उम्मीदवारों ने भी जीत दर्ज की थी। हालांकि, चुनाव के ढाई वर्ष बाद कांग्रेस के 18 नगरसेवकों ने बगावत करते हुए कोणार्क विकास आघाडी के साथ हाथ मिला लिया था। केवल 4 सीटों वाला यह दल गठबंधन के बल पर महापौर पद तक पहुंच गया था। 

अब लगभग तीन साल से प्रशासक राज लागू है और इस दौरान नेताओं ने एक बार फिर अपने खेमे बदलने शुरू कर दिए हैं। वर्तमान में भिवंडी महानगरपालिका की स्थिति कुछ इस प्रकार बताई जा रही है । कांग्रेस के पास 25 सीटें, भाजपा के पास 21, शिवसेना (शिंदे गट) के पास 12, कोणार्क विकास आघाडी के पास 4, समाजवादी पार्टी के पास 3, आरपीआई (एकतावादी) के पास 4, राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार गट) के पास 20, जबकि विकास आघाडी मंच के पास 1 सीट है।स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में हो रहे इस बदलाव और परिवारवाद की बढ़ती दावेदारी के बीच भिवंडी मनपा चुनाव इस बार बेहद रोचक और प्रतिस्पर्धात्मक होने की उम्मीद है।

रिपोर्टर

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