नहीं रहे भलुनी धाम एवं रोहतास के ‘महामना मालवीय’ कन्हैयालाल पंडित; पंचतत्व में हुए विलीन
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Feb 28, 2026
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रोहतास ।भोजपुरी भाषा-साहित्य, लोक-संस्कृति एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए पाँच दशकों से अधिक समय तक सतत सक्रिय रहे भलुनी धाम, रोहतास के प्रख्यात समाजसेवी-संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार एवं पर्यावरण योद्धा कन्हैयालाल पंडित का बुधवार को 84 वर्ष की आयु में पटना के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से भोजपुरी भाषा, साहित्य-जगत, सांस्कृतिक समुदाय तथा पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों में गहरा शोक व्याप्त है।
बक्सर के गंगातट स्थित श्मशान घाट पर 26 फरवरी को पूरे विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र मदन मोहन पांडेय ने मुखाग्नि दी। वे अपने पीछे पाँच पुत्र, तीन पुत्रियाँ, बहुएँ, नाती-पोते तथा असंख्य मित्र-शुभचिंतकों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।
लंबी बीमारी के बाद ली अंतिम सांस ।उल्लेखनीय है कि अगस्त 2025 में भोपाल प्रवास के दौरान उनकी तबीयत अचानक गंभीर रूप से बिगड़ गई थी। उन्हें चिरायु यूनिवर्सिटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया, जहाँ उन्होंने जटिल चिकित्सा उपचार प्राप्त किया। स्वास्थ्य में सुधार के बाद वे अपने पैतृक गाँव भलुनी धाम लौट आए थे और धीरे-धीरे पुनः सक्रिय होने लगे थे।
किन्तु स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव जारी रहा। 6 जनवरी 2026 को उन्हें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आपातकालीन विभाग में भर्ती कराया गया। उपचार के उपरांत स्थिति में सुधार होने पर वे घर लौटे, परंतु 10 जनवरी से पुनः स्वास्थ्य बिगड़ने पर फिर आपात चिकित्सा की आवश्यकता पड़ी। बाद में बनारस से लौटकर 14 फरवरी की देर रात पटना के सहयोग अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ अंततः उन्होंने अंतिम सांस ली
वे लंबे समय से उम्रजनित व्याधियों—जैसे मधुमेह, स्मृतिक्षीणता, पाचन एवं गुर्दे संबंधी समस्याएँ तथा मस्तिष्क में रक्त के थक्कों जैसी जटिलताओं—से जूझ रहे थे।
साहित्य और समाज सरोकारों के पुरोधा---
कन्हैयालाल पंडित जीवनपर्यंत भोजपुरी भाषा-साहित्य, लोक-संस्कृति, जल-जंगल-जमीन संरक्षण तथा ‘भलुनी धाम ईको पार्क’ जैसे सार्वजनिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध रहे। वे भलुनी धाम वन्य जीव प्राणी संरक्षा प्रबंध समिति के सदस्य तथा ‘श्री यक्षिणी भोजपुरी साहित्य समिति’ के संस्थापक संयोजक थे।
भोजपुरी साहित्य-जगत में उन्हें बनारस के भोजपुरी महाकवि चंद्रशेखर मिश्र द्वारा उनके शैक्षिक, साहित्यिक और सामाजिक योगदान के लिए “भलुनी धाम व रोहतास का महामना मालवीय” की उपाधि प्रदान की गई थी।
उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक संबंध देश के अनेक प्रतिष्ठित भोजपुरी विद्वानों एवं साहित्यकारों से रहे। इनमें विद्यानिवास मिश्र, रामेश्वर सिंह कश्यप (उर्फ ‘लोहा सिंह’), हवलदार त्रिपाठी सहृदय, कुंज बिहारी कुंजन, रामजी सिंह मुखिया, गणेशदत्त किरण, कुबेरनाथ मिश्र विचित्र, चकाचक बनारसी सहित अनेक मूर्धन्य रचनाकार सम्मिलित हैं।
शोक की लहर है।
उनके निधन पर साहित्य-संस्कृति जगत, पर्यावरण संरक्षण से जुड़े संगठनों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गहरा शोक व्यक्त किया है। विभिन्न संस्थाओं ने उन्हें भोजपुरी अस्मिता, लोक-संस्कृति और पर्यावरण चेतना का सजग प्रहरी बताते हुए कहा कि उनका जीवन समर्पण, संघर्ष और सृजनशीलता की मिसाल रहा।
भोजपुरी साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में उनका अवदान सदैव स्मरणीय रहेगा। भलुनी धाम एवं रोहतास ही नहीं, सम्पूर्ण भोजपुरी अंचल ने आज अपना एक प्रेरणास्रोत व्यक्तित्व खो दिया। जिसमें श्री यक्षिणी भोजपुरी साहित्य समिति भलुनी धाम के अध्यक्ष सर्वदेव ओझा, सुनील कुमार, राजवंश ओझा,अक्षैवरनाथ मिश्रा, लक्ष्मी ीराजगृही ओझा, कन्हैया पांडेय,छठु सिंह,धरीक्षण सिंह सहित सभी सदस्यों ने गहरी शोक संवेदनाएं प्रकट किया है।


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