मिटती परंपराएं बढ़ता खर्च नए-नए खुलने वाले वृधा आश्रम और तलाक के मामले,
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- May 12, 2026
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दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि कलम से
आजकल के दौर में दांपत्य जीवन में शास्त्रगत परंपराएं मिटती जा रही हैं और विदेशी परंपराएं दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐसे में सामाजिक वातावरण आपसी सौहार्द माता-पिता सास बहू का मधुर संबंध एक नया रूप लेकर समाज में स्थापित होते जा रहा है। किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में शादी का हो या धार्मिक अनुष्ठान का आपसी सहयोग आपसी लेन देन की परंपरा मिटती नजर आ रही है। सास बहू का प्रेम ससुर बहू का रिश्ता आज के समय में जो भी लगने वाले रिश्ते हो,की कोई परवाह आज के समाज में नहीं होती दिखाई दे रही है। आपसी भाईचारे के प्रेम से होने वाली शादियों की जगह आज दहेज मुंह बाए खड़ा है, कहीं बहू की प्रताड़ना,तो कही दहेज के लिए प्राथमिकी तो कहीं हत्याओं का सिलसिला और तलाक के मामलों से न्यायालय भरा पड़ा दिखाई दे रहा है। मामला यहीं तक नहीं रुकता कही-कही दूसरी शादियां तो कहीं-कहीं तीसरी शादियों का भी नौबत आते हुए समाज में दिखाई दे रही हैं। वैदिक परंपराओं से होने वाली शादियां द्वार पूजा का समय मंगलाचरण के साथ उच्चरित होने वाले मंत्र लोप होते दिखाई दे रहे हैं। जयमाल के माध्यम से होने वाली शादियों में जयमाल की परंपरा के चलते मंगलाचरण की परंपरा बिल्कुल छिन्न-भिन्न होती नजर आ रही है। वृद्ध माता-पिता की सेवा सास ससुर की सेवा की जगह वृधा आश्रम,अनाथ आश्रम खुलते दिखाई दे रहे है जिससे समाज टूटता नजर आ रहा है और रिश्ते में कड़वाहट पैदा हो रही। हमारी भारतीय संस्कृति की जो परंपरा रही है उसमें सबको जोड़कर एक साथ ले चलने की रही चाहे नाई हो या कपड़ा सीने वाला दर्जी या खाने के लिए पत्तल बनाने वाला कर्मी या पानी पीने के लिए मिट्टी का पात्र बनाने वाले लोग हो या समाज के घरों से भोज बनाने वाले के सहयोगी अपना गोतिया और गोतिनी का सहयोग सब कुछ बदल गया और पूरी तरह से विदेशी परंपरा सनातन धर्म के उल्टे धर कर लिया है जिसका परिणाम है कि समाज में आए दिन दांपत्य जीवन में अनेकों परिवर्तन हो रहे है और परिवाद के मामले न्यायालय की तरफ जाते दिखाई दे रहे हैं जिससे सामाजिक बिखराव, और सामाजिक ढांचा टूट रहा है। इसलिए हमें सनातन धर्म की परंपरा को पुनः जीवित करना होगा और वैदिक परंपरा के अनुसार वैवाहिक पद्धति की तरफ बढ़ना होगा अन्यथा आने वाले दिनों में सब कुछ समाप्त हो जाएगा और वृद्धा आश्रमों की संख्या बढ़ जाएगी।


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