विश्व के शिक्षण संस्थानों की कानूनों के तहत जातिवादी जहर घोलने वाला प्रथम राष्ट्र बना भारत
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Jan 27, 2026
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वरिष्ठ संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय की लेखनी से
दुर्गावती-कैमूर--
यदि शिक्षा नीति की हम बात करेंगे तो दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो शिक्षा विभाग में भेदभाव युक्त कानून बनाकर अपने ही देश में अपने ही छात्रों को और जनता को आपस में बार-बार लड़वाने का अवसर प्रदान करता हो और अच्छे अंक पाकर भी शिक्षण संस्थान से बाहर जाने का रास्ता तय करता हो।जहां बच्चे कुछ सीखने के लिए जाते हो ताकि सीख कर देश को अच्छे मार्ग पर ले जाने का रास्ता प्रशस्त करने का संकल्प लेते हो लेकिन उसी देश में वैसी संस्थानो में कहीं जातिवाद के नारे लगते हैं, तो कहीं जातिवादी नेता पैदा किए जाते हैं, तो कहीं जातिवादी कानून लागू किए जाते हैं, यह सब जहर बोने की राजनीति नहीं तो क्या है।क्या यही संविधान है की चुनाव जीत कर ऐसा कानून बनाओ कि देश में नफरत पैदा हो। इस देश को समझने के लिए दूसरे देश के लोग पहले सनातन की पृष्ठभूमि को पढ़ते हैं ताकि मानवता का कल्चर और आदर्श जहां का पैदाइशी संस्कार कैसे उत्पन्न हुआ। लेकिन उसी देश में आज भारतीय राजनेता हर दल के मिलकर क्या कर रहे है, कहां गया सबका साथ और सबके विकास का वादा, यूजीसी जैसे नफरती कानून बन गया। लेकिन यदि कि झूठी केश हुई तो उस केश कर्ता पर शिकंजा कसने का कोई कानून नहीं बना। आखिर क्या है मजबूरी क्यों नहीं बना? देश के तमाम राजनेताओं के मुंह पर लगे ताले उनके चेहरे पर भारतीय राजनीति में कालिख पोतने का इससे अच्छा उदाहरण क्या है? पहले अच्छे अंक पाने वालों को रोको, फिर विद्यालय में पढ़ने वालों को रोको, ऐसा अभियान इस देश को कहां लेकर जा रहा है और ले जाएगा। क्या इसके लिए भारत का इतिहास इन नेताओं को कभी माफ करेगा?तो देखा जाए तो भविष्य में कदापि नहीं ,लेकिन साथ में इस अत्याचार को सहने वाली जनता को भी इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। जनता की सेवा करने का संकल्प लेकर लोकतंत्र के आड़ लेने वाले बहुरूपिया अपने निजी कुर्सी के स्वार्थ में विश्व के इतिहास में देश के साख को गिराने वाले कहें जायेंगे। आज दुनिया के इतिहास में यूनिवर्सिटियों शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग में सबसे पिछड़ा बनने वाले देश के श्रेणी में क्या इतिहास भारत को नहीं रखेगा। इस देश में इस गंदगी का भेदभाव का श्रेय किसे दिया जाए लोकतंत्र को या संविधान में संशोधन कर इसकी ढांचा बिगाड़ने वालो को। जयचंद की श्रेणी में चल रहे भारतीय राजनीति में वर्तमान के नेताओं के द्वारा अब क्या-क्या देखने को मिलेगा वर्तमान दिख रही हैं, और भविष्य बताएगा।


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