एक तरफ जाति का नेम प्लेट लगाने पर जुर्माना तो दूसरी तरफ जाति प्रमाण पत्र बनाने की छूट

संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि कलम से 

दुर्गावती (कैमूर):-- एक कहावत चली आ रही है न खाता न बही जो सरकार कहे वही सही, दूसरी तरफ धार्मिक टीका चंदन लगाकर या जाती अनुसार प्रतीक चिन्ह लगा करके ऑफिस में तैनाती पर सरकारी कर्मचारियों पर प्रतिबंध लगाया जाता है। वही भारतीय संविधान में अंबेडकर को मोहरा बनाने वाले लोग संविधान बनाते हैं भेद भाव युक्त और दोष देते हैं संविधान को और यह कहते हैं कि कोई संविधान तोड़ेगा तो कार्रवाई होगी क्योंकि देश संविधान से चल रहा है और चलेगा चुकी बाबा साहब ने संविधान बनाया है।देश के सर्वोच्च पद पर बैठे प्रधानमंत्री चंदन टीका लगाकर माला पहन कर मंदिर में जा सकते हैं लेकिन दूसरी तरफ कर्मचारी अपनी नौकरी पर तैनात नहीं हो सकता।

एक तरफ जाति का नाम लेने पर प्राथमिकी दर्ज की जाती हैं तो दूसरी तरफ लोकतंत्र में जाती आधारित सीटों का चयन चुनाव लड़ने के लिए किया जाता है तथा सरकार के आदेश पर सरकारी कर्मचारी जाति प्रमाण पत्र तैयार किया जाता है तो दूसरी तरफ जाति का नाम लेने पर प्राथमिकी दर्ज की जाती है वाह रे कानून। जाती के नाम पर शिक्षा में दाखिला नौकरी में प्रवेश करने का अधिकार छात्र वृत्ति लेने का अधिकार दिया गया है और कहा जाता है संविधान तो बाबा साहब ने बनाया है और संविधान पर आ जाते हैं राजनेता वे यह नहीं कहते कि कानून हमने बनाया है ऐसा नहीं कहते और दोष देते हैं बाबा साहब को और बदनाम करते हैं। लोकतंत्र में सबको समान अधिकार मिला है लेकिन उसका उपयोग कहां हो रहा है कोई तो बताएं। तुगलक का नाम आप लोगों ने सुना होगा लोग कहते हैं बात-बात पर की तुगलकी फरमान है क्या यही कहावत आज सिद्ध होती दिखाई नहीं दे रही है। सो राजा गरीबी के पैमाने को बदल कर जाति आधारित बना दे जातियों में द्वेष उत्पन्न कर दे उसे क्या कहा जाए तुगलकी फरमान या और कुछ।

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