वन्य जीव विलुप्ति के कगार पर संरक्षण की जरूरत


रोहतास।वन जीव विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके है।आज घर से गौरेया एवं जंगलों से जानवर गायब से हो गये है। इस संबंध वन्य जीव पर चिंता व्यक्त करते हुए काशी संगम रोहतास के जिला संयोजक किशुनपुरा गांव निवासी कवि सह साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास ने बताया कि वन्य जीव हमारी प्राकृतिक धरोहरों का अभिन्न हिस्सा है। भारत दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जहां पर प्राकृतिक भिन्नता इतनी अधिक है। यहाँ घने जंगल, मरुस्थल, आद्रभूमि, पहाड़ी वन और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुर मात्रा है। आज बहुत तेजी से बढ़ती हुईं विश्व की जनसंख्या और मनुष्य के लालच एवं मानवीय मूल्यों की कमी ने वन्यजीवों को बहुत नुकसान पहुंचाया है। वन्य जीव हमारे इकोसिस्टम का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है जिससे न सिर्फ पर्यावरण संतुलन बल्कि प्राकृतिक सुंदरता भी कायम है। पिछले चार दशकों मैं पर्यावरण और वन्य जीवो को इतना नुकसान पहुंचाया गया और ख़त्म किया गया, शायद इतना कभी नहीं। आज दुनिया भर में कई प्रजातियां विलुप्त की कगार पर है। आज बहुत परिवर्तन देखा जा सकता है। वातावरण से गिद्धों का अस्तित्व लगभग खत्म सा होता जा रहा है। चिड़ियों के चहचाहट सीमित हो गई है। मक्का के खेतों में हजारों की संख्या में तोते दिखाई देते थे,आज ढूंढने से भी नहीं मिलते। मूंझ और बबूल के पेड़ों पर हजारों बया पक्षी के घोसले लटके मिलते थे अब देखने को नहीं मिलते या यूं कहें कि बबूल के पेड़ ही नहीं मिलते हैं। घरों में गौरैया चिड़िया फुदकती रहती थी। मुझे याद है कि जब मैं पिताजी के साथ प्रदर्शनी देखने जाया करता था, तो सर्कस में कई तरह के जानवर अपने करतब दिखाते थे। लेकिन आज धीरे-धीरे सब खत्म हो गया है। वन्य जीवो के खत्म होने के कई कारण है, लेकिन मेरे विचार से सबसे अहम कारण आदमी का लालच और पर्यावरण के प्रति उदासीनता है। हमने पर्यावरण को इतना नुकसान पहुंचाया है कि इसकी भरपाई होना आज संभव नहीं है। तालाब और पोखरों से कछुआ खत्म हो गए जो जल के शुद्धिकरण के अहम् घटक है। आये दिन आज भी कई बोरे कछुये देश विदेश की सीमाओं पर तस्करी करते पकड़े जाते हैं। बाघों की खाल, रीछ के नाखून और हाथी दांत जैसे अंगों की मांग होने से इंटरनेशनल रैकेट सक्रिय रहते है। इनकी तस्करी में इतनी डिमांड बड़ी है। तमाम सरकारी प्रयास और इन. जी.ओ. के वाबजूद इन जीवों की तस्करी को पूर्णता नियंत्रित नहीं किया जा सका है। आज भी जंगलों में तस्कर आदिवासियों की मदद से वन्य जीवो को मरवा रहे है। आज बहुत थोड़े जानवर चिड़ियाघरों और अभयारणों में सुरक्षित हैं। जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है। शोधों में पाया गया कि गाय,भैंस जैसे दूधारु पशुओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इंजेक्शन डिक्लोफिनेक के प्रयोग से मृत पशुओं को खाकर गिद्धों की भी आबादी लगभग खत्म सी हो गई है। एक ऐसा भी समय था जब किसी पशु की मृत्यु होती थी तो कसाई उसकी चमड़ी या खाल निकाल लेते थे और कुछ ही घंटे में हजारों की संख्या में गिद्ध टूट पड़ते थे और सारा मांस चट कर जाते थे। वास्तव में कौवा, गिद्ध, सियार,कुत्ते आदि सब प्रकृति के जमादार कहे जा सकते हैं। आज जब किसी पशु की मृत्यु हो जाती है, नगर पालिका के लोग ठिकाने लगाते हैं और यदि संज्ञान में नहीं है तो सप्ताह भर पशु सड़ता रहता है, गांवों के लोग नहर करहा में फेंक देते हैं जो पूरे इलाकों को प्रदूषित करता है। जब तक वह डीकंपोजिट नहीं हो जाता। आज कई वन्य जीव गलत धारणाओं और अंधविश्वासों के चलते मनुष्य के लालच का शिकार बना दिया है। जब मैं पढ़ता था और स्कूल से लौटते वक्त में देखा करता था कि रोड किनारे तांत्रिक टाइप के लोग मजमा लगाकर एक तेल बेचा करते थे जिसको शक्ति वर्धक कहकर प्रचारित किया जाता था और भोले भाले छोटे छिपकली प्रजाति के जीव सांड को जिंदा ही उबालकर उसे तेल निकाल लेते थे। कितनी दर्दनाक और अमानवीय काम है। बहुत ताज्जुब तब होता है जब समाज गलत का विरोध नहीं करते। धर्म के ठेकेदारों एवं राजनेताओं ने वन्यजीव और पर्यावरण के मुद्दों पर कभी गंभीरता से नहीं लिया। कुछ एन.जी.ओ. और संगठनों के प्रयासों से थोड़ा बहुत इस पर काम किया जा रहा है। भारत में सन 1972में एक अधिनियम के तहत वन्य जीव संरक्षण अधिनियम लाया गया। जिसके तहत जंगली जानवरों के संरक्षण पर विशेष ध्यान और दोषियों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान रखा गया है। कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आई.यू.सी.एन. और डब्लू. डब्लू.एल.एफ. जैसी संस्थाएं दुर्लभ एवं विलुप्तप्राय प्राणियों के संरक्षण पर काम एवं धन एकत्रित करती है। वृक्षों की अंधा धुंध कटान और जनसंख्या के बढ़ते घनत्व के कारण कई विकराल समस्याएं पैदा हुई है। जंगलों में बड़ी तादात में आग लगना भी वन्य जीव को नुकसान पहुंचा रहा है। जब तक देश की सरकारे, लोग और समाज जागरूक होकर उनसे प्रेम नहीं दिखाएगा, उनकी आवश्यकता को नहीं समझेगा, तब तक इनका संरक्षण कैसे हो सकता है? आजकल लोग चंबल नदी में डॉल्फिन जैसे भोले- भाले जीव का भी शिकार करने में लगे जो एक गंभीर विषय है। वनों के अभाव से भटक रहे नीलगाय और बारहसिंगा और हिरण के प्रजातियों इधर-उधर अपने अस्तित्व बचाने के लिए भटक रहे हैं। लोग देखते ही मांस के लिए इन्हें मार ही डालते हैं। वन्य जीवो की निर्मम हत्या और पर्यावरण के खिलाफ इतना विनाश कही न कही मानव जाति को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।यदि ऐसा ही रहा और संहार नहीं रोका गया तो हम अपने आने वाली पीढियां को केवल उनकी कहानी और उन्हें तस्वीरों में ही दिखा पाएंगे । वन्य जीव संरक्षण की जरूरत है। जिससे प्रकृति में संतुलन बना रहे।जिसको बचाव करने की जरूरत है।

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