मानवता के विरुद्ध दानवता की राह पर चल पड़ी भारतीय राजनीति
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Feb 21, 2026
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दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि रिपोर्ट
दुर्गावती (कैमूर) - देश को मानवता की राह पर चलने के लिए संविधान बनाया गया है या दानवता की राह पर चलने के लिए कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जिस तरह से भारतीय संविधान में एक के बाद एक संशोधन हुए वह मानवता की राह पर नहीं दानवता की राह पर ले चलने वाले साबित हो रहे हैं। भारतीय संविधान में सनातन धर्म की परंपरा को अंग्रेज और मुगलों से भी ज्यादा नष्ट कर डाला आज के राजनेताओं ने। आज समाज में मां-बाप वृद्धा आश्रम भेजे जा रहे हैं तो कहीं नाबालिकों से रेप और बलात्कार जैसी दूर दांत कहानी सुनने को मिल रही हैं तो कहीं पति की पत्नी हत्या कर देती है तो कहीं पति-पत्नी की हत्या कर दे रहा है। मामला यहीं शांत नहीं हो रहा है सांस कभी दामाद के साथ भाग जा रही है तो लव मैरिज की परंपरा पति को ड्रम में हत्या कर डाल देना तो कभी पत्नी के टुकड़े-टुकड़े कर फ्रिज में डालने की परंपरा की तरफ प्रेरीत कर रही है। हत्याओं के दौर का परंपरा और तरीका ऐसा बदल गया है की जिसे समझ पाना बिल्कुल कठिन है कभी सांप से कटवा कर हत्या किया जाता है तो कभी हनीमून में बे मौत मार दिया जाता है तो कही पत्नी तो हत्या तो कहीं पति हत्या हो जाती हैं क्या यही है भारतीय राजनीति की परंपरा और संवैधानिक ढांचा। कहीं चचेरी बहन से कोई प्यार कर लेता है तो कहीं चाचा से कही चाची से कोई संबंध बना लेता है तो कहीं पड़ोसी के साथ चार बच्चे की मां भाग जाती है क्या हो रहा है इस देश में। समाज के सांस्कृतिक रहन-सहन की परंपरा को जिस तरह से जातिवाद, भेद भाव की परंपरा, लव मैरिज की परंपरा, बनाकर देश को छिन्न-भिन्न किया गया वह संविधान की दुहाई लगाकर वह ठीक नहीं है किया गया। बाबा साहब को मजाक बनाकर छोड़ दिया गया राजनेताओं के द्वारा और केवल यह कहा जाता है कि बाबा साहब ने संविधान को लिखा है। बाबा साहब के लिखे गए संविधान में जो बदलाव किया गया समाज को सही दिशा की तरफ ले जाने के लिए वह सही दिशा में न लेजाकर आज उलटी दिशा में ले जाने का काम कर रहा हैं। सनातन धर्म के मुताबिक शिक्षा की पद्धति में जो मूलभूत बदलाव किए गए वह समाज को मानवता की तरफ नहीं दानवता की तरफ ले जाने वाला साबित हो रहा है। यदि संविधान के मूल प्रस्तावना में संशोधन नहीं किया गया होता या संविधान से सनातन धर्म की शिक्षा की पद्धति को नहीं हटाया गया होता तो आज जो कुकृत्य समाज में हो रहा है और देखने को मिल रहा है वह नहीं होते और ने देखने को मिलता, न हीं सामाजिक ताना बाना और ढांचा में कोई बदलाव हुआ होता। क्योंकि सनातन धर्म की शिक्षा समाज में रहने माता-पिता भ्राता बहन भाई का के संबंध को सही दिशा देने का संदेश देता है और उसकी शिक्षा पद्धति से रहन-सहन जीवन यापन की दिनचर्या सही ढंग से चलती। लेकिन एक के बाद एक समाज के द्वेष युक्त कानून देश को विभाजित करने वाले मोड पर लाकर खड़ा कर दिए। अन्य वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति के साथ-साथ अगर तत्काल सनातन धर्म की शिक्षा पद्धति देश में लागू नहीं की गई तो सामाजिक ढांचा इससे भी अधिक बदतर होगा जिसे सम्भाल पाना आने वाले युग में मुश्किल होगा।
दुर्गावती


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