यूजीसी पर सुप्रीम कोर्ट रोक नहीं लगाया होता तो आज देश नफरत की आग में लपटों में जलता रहता है
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Feb 28, 2026
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देश में कटुता और नफरत का जन्म दाता है आरक्षण
दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि रिपोर्ट
दुर्गावती (कैमूर)- यदि न्यायपालिका रोक नहीं लगाई होती तो यूजीसी का जो आरक्षण आया देश में उससे आज पूरा देश जलता रहता। सच पूछा जाए तो समाज को बांटने और नफरत को फैलाने का नाम ही है आरक्षण, इसे देश के अंदर लोगों को जाति में बांटना प्रमुख कारण कहना अनुचित नहीं होगा।जिस जाती का नाम लेने से एससी एसटी एक्ट लागू हो जाता है उसका नाम है आरक्षण, जाति का नाम लेने पर केस, लेकिन बड़े खुशी और हर्ष के साथ नफरती आरक्षण के कानून का सहारा लेने के लिए दफ्तरों में जाति प्रमाण पत्र खुशी खुशी बनवाते हैं आरक्षण धारी लेकिन जाति का नाम लेने पर होते हैं नाराज। यह कानून राजनेताओं की सोची समझी राजनीति के चलते सनातन धर्म में और अन्य धर्मों में एक लकीर पैदा कर दिया है। जिसके चलते एक दूसरे जाती को देखकर लोगों की गुर्राने और नफरत करने का सिलसिला कम होने की वजह दिन दूना और रात चौगुन बढ़ता नजर आ रहा है। पूर्व की सरकार और वर्तमान सरकार अंग्रेजों की तरह बाटो और शासन करो कि यह राजनीति देश को कितना नुकसान पहुंचाएगी और पहुंच रही है जिसका अंदाजा अभी और आने वाले भविष्य में कितना भुगतना होगा कुछ कहा नहीं जा सकता है।गरीबी की तुलना किसी जाति को देखकर नहीं किया जा सकता है न गरीबी जात पात देखकर आती है। यदि सच पूछा जाए तो गरीबों के नाम पर कानून बनाकर सुविधा देने का जो कानूनी तरीका है वह देश को बांटने के तरीका के रूप में बदल रहा है और बदल चुका है यह कानून देश में एकता फैलाने का नहीं कुर्सी बरकरार रखने का है। देश द्रोह के पैमाने की यदि हम बात करें तो जो कानून देश में अशांति फैलता हो नफरत फैलता हो जो देश को कमजोर करता हो जाति में बांटता हो वह देशद्रोह के रूप में क्या नहीं आता क्या यह आपसी प्रेम फैलाने वाला है या गरीबी मिटाने वाला या देशद्रोह फैलाने वाला या यदि जाति में बांटने वाला कानून कहना उचित नहीं होगा। इस कानून के चलते आज समाज में नफरत और द्वेष समाज में इस तरह से बढ़ गया है, और बढ़ रहे हैं कि कोई धर्म पर उंगली उठाता है कोई किसी के धर्म को ही गाली देता है तो कोई अंतरजातीय विवाह का सपना देखता है तो कोई ब्राह्मण लड़कियों पर ही सवाल उठा देता है और शादी करने तक का मंसूबा रखता है। यह सब नफरती कानून किसने बनाया और क्यों बनाया क्या यह देश को कमजोर नहीं कर रहा है क्या संविधान इसकी इजाजत देता है , क्या समाज को यह कानून बांट नहीं रहा है। संविधान सबको साथ लेकर चलने का संकल्प लेता है समानता का अधिकार देता है तो फिर भेदभाव युक्त कानून कुर्सी को प्राप्त करने के लिए बनाना देशद्रोह नहीं है तो क्या है। इसलिए सरकार को चाहिए कि देश के अंदर जो भी कानून समाज को बांटता हो नफरत फैला कर भाईचारे को कमजोर करता हो उस पर तत्काल रूप से रद्द कर देना चाहिए। सच पूछिए तो देश के हित में संविधान में संशोधन करके समता के अधिकार के तहत समान नागरिक संहिता लागू कर देना ही उचित होगा तब जाकर समाज में समरसता भाईचारा और पारदर्शिता कायम की जा सकती है। यदि सचमुच सरकार भेदभाव युक्त कानून आरक्षण या धार्मिक कानून नहीं बनाई होती तो आज देश में जनता के बीच भाईचारा की जगह नफरत नहीं कायम होता इसलिए देश के अंदर जातिवाद का जन्मदाता राजनेताओं को कहना अनुचित नहीं होगा। साथ में पढ़ना साथ में खाना साथ में होटल में ठहरना , बारात के एक पंडाल में, एक स्टॉल पर समान रूप से मिलना खाना यहां तक की अंतर्जातीय शादी करने का प्रावधान शुरू हो चुका है। ऐसी स्थिति में समाज में वोट के लिए और कानूनी कुर्सी के लिए नफरत का बीज बो कर समाज को टुकड़े-टुकड़े करना उचित नहीं है इससे देश का भविष्य बनने की जगह और बिगड़ेगा।


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