अप्रशिक्षित डॉक्टर अप्रशिक्षित जांच लैब की चारों तरफ खुली दुकान,न रेट,न फीस की कोई सीमा है तय
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Apr 15, 2026
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दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि रिपोर्ट
दुर्गावती (कैमूर):-- कर्मचारियों का वेतन तय है पेंशन तय है ट्रेन का भाड़ा तय है नेताओं समय सीमा तनख्वाह तय है लेकिन डॉक्टर का और जांच का फीस कितना है कुछ भी तय नहीं है। आजकल अप्रशिक्षित डॉक्टरों की बाढ़ देश में आ गई है न जांच का कोई रेट है न जांच केंद्र पर कोई प्रशिक्षित जांच परीक्षक, न डिग्री के अनुसार डॉक्टरों का फीस, इस तरह से मनमानी ढंग से चलती स्वास्थ्य व्यवस्थाएं कितनों को काल के हवाले कर देती हैं। दिल्ली से लेकर देश के हर कोने में सरकार की आंखों के नीचे या प्रधानमंत्री के क्षेत्र वाराणसी में यह लूट का खेल जारी है लेकिन सब के आंखें खामोश है और जुबा पर ताला लगा हुआ है। किसी बड़े डॉक्टर के साथ काम कर लो या छोटे डॉक्टर के साथ फिर डॉक्टर बन जाओ किसी जांच केंद्र में कुछ दिन काम कर लो और जांच केंद्र खोल दो आए दिन ऐसे डॉक्टर और ऐसे जांच केंद्र पूरे देश में अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके हैं, न डिग्री के अनुसार डॉक्टरों का फीस निर्धारित है न रोग के अनुसार जांच केंद्र का मूल्य निर्धारित है। आजाद भारत में लोकतांत्रिक प्रणाली में यह खेल स्वास्थ्य विभाग में जो चल रहा है उसमें सरकारों का सह माना जाए तो कहना अनुचित नहीं होगा क्योंकि सरकार केंद्र की हो या राज्य की सब की आंखों के नीचे यही खेल चल रहा है और एक ही राग बज रहा है कमाओ खुले हाथ भले जनता कराहती रहे और जन चली जाए। महंगी दवाइयां महंगी चिकित्सा की प्रणाली आजाद भारत में और लोकतांत्रिक प्रणाली को कहां लेकर जा रही हैं इसका कोई माई बाप नहीं है जिसके कारण यह स्वास्थ्य विभाग का यह खुल्लम खुल्ला खेल चल रहा है। इलाज के दौरान यदि मरीज मर भी जाता है तो कई दिनों तक उनके शव को रोक कर पैसो की जबरदस्ती वसूली की जाती है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है न कोई कानून है। सरकार के स्वास्थ्य कार्ड देने से डॉक्टर रोगों को और बढ़ा देते हैं और सरकार के दी हुई राशि को वसूलने के लिए कई दिनों तक मरीजों को अस्पताल में रोक लेते हैं जब पूरा हेल्थ कार्ड का पैसा निकल जाता है तब उसे छोड़ते है लगता है मानवता मर चुकी है, नेताओं और डॉक्टरों की भी। आज यदि एक गरीब सोचे की अच्छे डॉक्टर को मैं दिखाकर इलाज करा सकूं तो महंगे दवाई और महंगी फिश होने के कारण वह व्यक्ति वहां तक नहीं जा पाता तो फिर काहे का आजादी और काहे का लोकतंत्र कुछ समझ में नहीं आता। आए दिन अप्रशिक्षित डॉक्टर के द्वारा मानक के अनुरूप हॉस्पिटल नहीं होने के बाद भी ऑपरेशन का सिलसिला जारी है जो संबंधित जांच अधिकारियों के आंखों के नीचे यह सब हो रहा है क्योंकि वह देख करके भी अनदेखी कर रहे हैं आखिर कार किसके सह पर यह विचारणीय विषय है। उन डॉक्टरों को न कानून का भय है न जांच एजेंसियों का डर यह है आपका लोकतांत्रिक प्रणाली। अब तो स्वास्थ्य विभाग में आरक्षण 0 - पर डॉक्टर की शिक्षण संस्थान में एंट्री और चिंता बढ़ा दिया है यह देश राम भरोसे चल रहा है न कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भरोसे है आप सब विचार करे। मेडिकल संस्थानों में हो रहे महिलाओं के साथ अत्याचार शोषण रेप हत्या जैसी घटनाएं आए दिन सुनने और देखने को मिल रही है और जांच के नाम पर जीरो की प्रक्रिया देश में चल रही है क्या संविधान को माना जाए आप स्वयं विचार कर ले।जान सस्ता बा महंगा दवाई बारे लोगवा कहेला महंगाई बारे


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