कभी रोजगार और आत्मनिर्भरता का केंद्र, अब अस्तित्व बचाने की चुनौती
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Mar 30, 2026
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संवाददाता पारस नाथ दुबे
डिहरी आनसोन।डेहरी में वर्ष 1954-55 के दशक में स्थापित खादी भंडार का स्टोर कभी इलाके की पहचान और आर्थिक गतिविधियों का अहम केंद्र हुआ करता था। उस समय रोहतास उद्योग एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था, जिसके चलते खादी उत्पादों की बिक्री के लिए यहां विशेष बिक्री केंद्र बनाया गया था।
खादी भंडार का मुख्य उद्देश्य न केवल खादी का प्रचार-प्रसार करना था, बल्कि स्थानीय बुनकरों को रोजगार उपलब्ध कराना भी था। उस दौर में खादी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की भावना का प्रतीक मानी जाती थी।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशवासियों से चरखा चलाने और खादी पहनने का आह्वान किया था। उनका मानना था कि खादी देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता, एकता और ग्रामीण रोजगार का मजबूत आधार बन सकती है। उन्होंने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर खादी को अपनाने की अपील की थी, ताकि देश आत्मनिर्भर बन सके और गरीबों को रोजगार मिल सके।
लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए। वर्ष 1984 में रोहतास उद्योग के बंद होने के बाद खादी भंडार की बिक्री पर गहरा असर पड़ा। धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता घटती गई और स्थिति ऐसी हो गई कि खादी भंडार बंद होने के कगार पर पहुंच गया।
आज के दौर में बाजार में आधुनिक और आकर्षक टेक्सटाइल कपड़ों की भरमार हो गई है। फैशन के इस युग में खासकर युवाओं का रुझान नए डिजाइनों और ब्रांडेड कपड़ों की ओर ज्यादा हो गया है। इसके कारण खादी पहनने का चलन काफी कम हो गया है।
वर्तमान में खादी का उपयोग मुख्य रूप से बुजुर्गों तक ही सीमित रह गया है, जो पहले से ही इसे अपनाते आए हैं। ऐसे में डेहरी का यह ऐतिहासिक खादी भंडार अपनी पहचान और अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
जरूरत है कि खादी को फिर से आधुनिकता के साथ जोड़कर युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाया जाए, ताकि यह सिर्फ अतीत की विरासत न रहकर भविष्य का भी हिस्सा बन सके।


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