झाड़ फूंक के चक्कर में 9 वर्षीय मासूम की मौत, 6 वर्षीय भाई की हालत गंभीर

विगत रात सर्पदंश से बिगड़ी हालत स्वास्थ्य केंद्र न पहुंच परिजन पहुंचे झाड़ फूंक करवाने 

संवाददाता रूपेश कुमार दुबे की रिपोर्ट 

कैमूर------ जिले के कुदरा थाना क्षेत्र के अजगरा गांव से अंधविश्वास की एक दर्दनाक और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। सर्पदंश के बाद समय पर अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक कराने के कारण एक 9 वर्षीय मासूम की मौत हो गई, जबकि उसका 6 वर्षीय छोटा भाई जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। गंभीर हालत में उसे बेहतर इलाज के लिए बनारस रेफर किया गया है।

यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग अंधविश्वास के जाल में फंसकर वैज्ञानिक चिकित्सा से दूर हो जाता है और इसकी कीमत मासूम जानों को चुकानी पड़ती है।

जानकारी के अनुसार अजगरा गांव निवासी सत्येंद्र बैठा के दोनों पुत्र धर्मवीर (9 वर्ष) और धर्मराज (6 वर्ष) गुरुवार की रात घर की छत पर सो रहे थे। देर रात किसी जहरीले सर्प ने दोनों बच्चों को डंस लिया। परिजनों को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाने के बजाय पास के कर्मा गांव में झाड़-फूंक कराने के लिए ले जाया गया।

ग्रामीणों के अनुसार कई घंटों तक ओझा द्वारा झाड़-फूंक की जाती रही। इस दौरान दोनों बच्चों की हालत लगातार बिगड़ती चली गई। जब स्थिति बेहद गंभीर हो गई तब उन्हें इलाज के लिए मोहनियां अनुमंडल अस्पताल लाया गया।

मोहनियां अनुमंडल अस्पताल में चिकित्सकों ने जांच के बाद बड़े भाई धर्मवीर को मृत घोषित कर दिया। वहीं छोटे भाई धर्मराज की हालत अत्यंत गंभीर देखते हुए उसे प्राथमिक उपचार के बाद भभुआ सदर अस्पताल भेजा गया। वहां से भी बेहतर इलाज के लिए बनारस रेफर कर दिया गया, जहां उसका इलाज जारी है।

मासूम बेटे की मौत के बाद पूरे परिवार में मातम पसरा हुआ है। गांव में भी घटना के बाद शोक का माहौल है

परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर बताई जा रही है। पिता मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।

गांव के महेंद्र कुमार ने बताया कि यदि बच्चों को सर्पदंश के तुरंत बाद अस्पताल ले जाया जाता तो संभवतः धर्मवीर की जान बच सकती थी। उन्होंने जिला प्रशासन से पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता और मुआवजा देने की मांग की है। साथ ही लोगों से अपील की कि सर्पदंश जैसी स्थिति में झाड़-फूंक के बजाय तत्काल अस्पताल पहुंचें।

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के सामने एक गंभीर सवाल भी खड़ा करती है। विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में भी यदि लोग झाड़-फूंक और अंधविश्वास पर भरोसा करेंगे तो ऐसी दर्दनाक घटनाएं होती रहेंगी।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार बताते रहे हैं कि सर्पदंश एक मेडिकल इमरजेंसी है। अधिकांश जहरीले सांप के काटने के मामलों में समय पर अस्पताल पहुंचने और एंटी-स्नेक वेनम (ASV) देने से मरीज की जान बचाई जा सकती है। बिहार के सरकारी अस्पतालों में भी सर्पदंश के इलाज की व्यवस्था उपलब्ध है।

यह घटना बताती है कि केवल स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। लोगों में जागरूकता फैलाना भी उतना ही आवश्यक है। प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को गांव-गांव जाकर लोगों को यह समझाना होगा कि सर्पदंश होने पर झाड़-फूंक नहीं, बल्कि तत्काल अस्पताल ही जीवन बचाने का सबसे सुरक्षित और प्रभावी उपाय है।

यदि किसी व्यक्ति को सर्प काट ले तो घबराएं नहीं। मरीज को शांत रखें और बिना समय गंवाए नजदीकी सरकारी अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाएं। झाड़-फूंक, ओझा-गुनी या घरेलू उपचार के भरोसे समय बर्बाद करना जानलेवा साबित हो सकता है।

धर्मवीर की मौत केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि अंधविश्वास के खिलाफ समाज के लिए एक कड़ा संदेश है कि समय पर वैज्ञानिक इलाज ही जीवन बचा सकता है।

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