युद्ध नहीं,शांति चाहिए हिरोशिमा पर 6 अगस्त को ही गिरा था बम
- एबी न्यूज, डेस्क संवाददाता
- Aug 07, 2026
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रोहतास। काशी काव्य संगम रोहतास जिला संयोजक साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास किशुनपुरा गांव से हिरोशिमा वर्षगांठ पर बताते हैं कि यजुर्वेद में पवित्र वैदिक शांति पाठ है –
ॐ द्यौ: शांतिरन्तरिक्षं शांति: ... ।
इसका हिंदी रूपांतरण कुछ यूँ है कि आकाश में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो, औषधियों में शांति हो, वनस्पतियों में शांति हो। विश्व के सभी देवता शांत हों, ब्रह्म शांत हों, सब कुछ शांत हो। वह परम शांति सदैव बनी रहे। ॐ शांति, शांति, शांति।
आगे कवि सुनील कुमार रोहतास कहते हैं कि भारतीय संस्कृति और दर्शन का मूलभूत सिद्धांत है-- शांति, अहिंसा, वसुधैव कुटुंबकम्। सच बात तो ये है कि ये सिर्फ सिद्धांत नहीं, जीने की कला है।
विवेकानंद कहें है, शांति केवल बाहरी सन्नाटा नहीं, मन की आंतरिक स्थिति है और इस स्थिति में रहकर ही अपना और मानवता का सही अर्थों में विकास हो सकता है।
युद्ध कभी भी पहला नहीं, आख़िरी विकल्प होता है और तब भी यह लाता विनाश ही है। युद्ध का जीवन से कोई लेना देना नहीं। हम सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर लिटिल बॉय नामक परमाणु बम गिराया था जिसने पलक झपकते ही पूरा शहर तबाह कर दिया। हजारों लोगों ने जानें गंवाई और इसकी रेडिएशन के दुष्प्रभावों के कारण आने वाली कई पीढ़ियों तक लोगों ने गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना किया। इस हमले के बाद जीवित बचे हिबाकुशा ने कैंसर जैसी बीमारियों को झेला। अमेरिकी बमवर्षक विमान एनोला गे से गिराया गया बम जमीन से 600 मीटर ऊपर हवा में फटा और अचानक तापमान 4000°C तक पहुँच गया। हवा में फैले राख, धुएँ और रेडिएशन के कारण शहर में काली जहरीली बारिश हुई जिसके पानी से लोग बीमार हो गए। युद्ध - विभीषिका के घातक परिणामों के बावजूद दुनिया भर में आज भी बड़े-बड़े गंभीर सैन्य- संघर्ष और युद्ध चल रहे हैं, जबकि पता है कि क्षति दोनों तरफ होनी है।
मध्यपूर्व संघर्ष - अमेरिकी इज़राइल और ईरान के बीच जिसने समूची दुनिया में युद्ध जैसे हालात पैदा कर दिये थे। रूस और यूक्रेन का युद्ध जो 2022 में शुरू हुआ और 26 में भी जारी है। सूडान का गृहयुद्ध – सूडानी सशस्त्र बलों और रैपिड सपोर्ट फोर्सेज के बीच छिड़ी भीषण जंग ने लाखों लोगों को संकट में डाल रखा है।
दुनिया आज बारूद के ढेर पर बैठी है। एक चिंगारी लगी और सब स्वाहा। लेकिन ऐसा नहीं है कि परमाणु ऊर्जा केवल विनाशकारी ही है। जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया तो वैज्ञानिकों का ध्यान इसके शांतिपूर्ण उपयोग की तरफ भी गया और बहुत कम ईंधन से बड़ी तादाद में बिजली उत्पन्न करने के लिए परमाणु रिएक्टर विकसित किये गए। कैंसर ट्यूमर को नष्ट करने में इसका उपयोग किया जाता है। परमाणु विज्ञान से खाद्यान्न को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कीट-प्रतिरोधी किस्मों का विकास हुआ है। परमाणु ऊर्जा ने पनडुब्बियों को बिना रीफ्यूलिंग के वर्षों तक पानी के अंदर रहने की क्षमता दी है जो डीजल या ईंधन द्वारा असंभव है। यह कोयले और तेल का विकल्प है क्योंकि 1 ग्राम यूरेनियम से कई टन कोयले के बराबर ऊर्जा मिलती है। लेकिन इसका सर्वाधिक उपयोग मानवता के विनाश में हो रहा है। इसके पीछे के कारण हैं – अपनी शक्ति का प्रदर्शन, झूठा अहंकार, दूसरे देशों को डोमिनेट करने की प्रवृत्ति आदि।
युद्ध चाहे त्रेता में हो, द्वापर में हो या कलियुग में हो, धर्म स्थापना के लिए हो या गर्व स्थापना के लिए: धरा रक्तरंजित ही होती है, मानवता की हार ही होती है, ज़िंदगी तार- तार ही होती है।
यह धरा एक है, आकाश एक है, धमनियों में दौड़ने वाला रक्त एक है, भूख एक है, प्यास एक है, खुशी और दर्द भी एक है तो फिर मानव मानव का इतना बड़ा दुश्मन क्यों?
हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है जबकि प्यार प्यार को फैलाता है। मन की पवित्रता, धैर्य, अहिंसा के प्रति श्रद्धा और प्रेम वे शक्तियाँ हैं जो मन को शांत और शुद्ध करके अपने आसपास भी इन्हीं विचारों का संक्रमण फैलाती हैं।
जापान के पीस मेमोरियल पार्क में एक पीस फ्लेम (शांति की ज्वाला) जल रही है और तब तक जलती रहेगी जब तक पूरी दुनिया से परमाणु हथियार खत्म नहीं हो जाते।
आइए, शांति की ज्वाला अपने अंदर भी जलायें और बाहर भी ताकि इस धरा पर शांति और सुकून हो।


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