बिहार विधानसभा के चुनाव पर एक नजर
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Oct 22, 2025
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बिच्छुब्ध नेताओं द्वारा प्रचार कर रहे पार्टियों के विरूद्ध चुनाव लड़ने के साथ ही, अपने ही पार्टी को हराने का कुचक्र हुआ शुरू
कैमूर-- अखिल भारतीय समाचार जिला के दुर्गावती प्रखंड क्षेत्र के वरिष्ठ संवाददाता श्याम सुंदर पाण्डेय की, बिहार विधान सभा चुनाव की एक समीक्षा--
बिहार-- में विधानसभा चुनाव के नामांकन का दौर समाप्त हो चुका है, लेकिन जातीय आधारित टिकट के आधार पर पार्टियों के द्वारा सीटों का बंटवारा और मतदाताओं की सोच आज भी बिहार में बरकरार है। अपनी-अपनी पार्टी के विक्षुब्ध नेताओं का रोना गाना कई संगीन आरोप लगाना साथ ही पार्टी बदलने का दौर भी अब समाप्त हो चुका है। भोली भाली जनता के सामने नेताओं का रेस और आकाशीय नेताओं के हेलीकॉप्टर का शोर बाहुबल की धमक बिच्छुब्ध नेताओं द्वारा अपने ही पार्टी को हराने का कुचक्र शुरू हो चुका है। देश में भेदभाव युक्त कानून आरक्षण जैसी कुप्रथा में फंसी जनता को उबारने की आवाज कहीं से सुनाई नहीं दे रही है। धार्मिक आस्थाओं पर चोट करने वाले नेता भी मैदान में आ चुके हैं, केवल अधिकांश पार्टी भ्रष्टाचार की बात कर रही हैं जबकि अपने पूर्व उम्मीदवारों को और मंत्रियों को उनकी स्थिति का आकलन कर ले तो पता चल जाएगा भ्रष्टाचार में कौन लोग लिप्त है और भ्रष्टाचारी नेताओं में कितनी कमी आई है। खासकर कैमूर जिले के सीटों के बंटवारे में नेताओं के द्वारा सीटों का मनमानी ढंग से बंटवारा करना विधानसभा में विक्षुब्ध नेताओं का नामांकन कुछ नेताओं के द्वारा पार्टियों को बदलकर चुनाव मैदान में आना यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है,अब देखना यह है कि इसका असर कितना चुनाव में दिखाई देता है। उच्च तकनीकी उक्त यूनिवर्सिटी, आईटी सेक्टर, अनुसंधान केंद्र, आर्थिक उद्योग, इंडस्ट्रियल जोन, मजदूरों के पलायन को रोकने का रोड मैप बनाने में आजादी के बाद से आज तक की सभी सरकारे फेल रही है फिर भी सुर में कोई बदलाव नहीं है। जातीय भावनाओं में मदमस्त जनता आज भी नेताओं के जातीय जाल में फंस हुई है, न उसके पास अपना स्वविवेक है न अपने आने वाली पीढियों की चिंता, अब देखने यह है कि बिहार का चुनाव बिहार की जनता किस आधार पर तय करती है। एक कहावत है रोपे पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।


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