बोधगया में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महोत्सव: 50 बुद्ध की रेत मूर्तियों का वर्ल्ड रिकॉर्ड, विश्व शांति का संदेश देती मधुरेंद्र की भव्य कला*

जिला ब्यूरो चीफ की रिपोर्ट 

गया-- ज्ञान और मोक्ष की धरती बोधगया के कालचक्र मैदान में आयोजित अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महोत्सव इस वर्ष विश्व शांति के संदेश के साथ और भी खास बन गया। महोत्सव के अवसर पर अंतरराष्ट्रीय सैंड आर्टिस्ट मधुरेंद्र कुमार ने 10 घंटे की कठिन मेहनत से 15 टन बालू का उपयोग कर 10 फीट ऊंची पीपल के पत्ते के आकार में भगवान बुद्ध की भव्य प्रतिमा का निर्माण किया। उनकी इस अद्भुत कलाकृति ने देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं और पर्यटकों का मन मोह लिया।मधुरेंद्र कुमार ने भगवान बुद्ध के जीवन पर आधारित राजकुमार सिद्धार्थ से लेकर महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण तक की 50 अनूठी रेत मूर्तियां बनाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया। इस असाधारण उपलब्धि के लिए उन्हें एशियन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा सम्मानित किया गया। साथ ही यूएन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी उनका नाम दर्ज किया गया है। यूएन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के इंटरनेशनल कोऑर्डिनेटर प्रोफेसर बुहारी ईसाह ने ईमेल के माध्यम से आधिकारिक बधाई देते हुए कहा कि मधुरेंद्र कुमार को “संयुक्त राष्ट्र” की ओर से विश्व शांति, अहिंसा और सद्भाव का संदेश देने वाले महात्मा बुद्ध की 50 रेत मूर्तियां निर्मित करने के असाधारण रिकॉर्ड के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया है।बिहार सरकार के पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन गया द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महोत्सव देश-विदेश के कलाकारों और श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहता है। मुख्य मंच की सजावट और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच मधुरेंद्र की रेत कला विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रही। बौद्ध महोत्सव के इतिहास में वे पहले ऐसे रेत कलाकार हैं, जिन्हें यूएन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने का गौरव प्राप्त हुआ है।वर्ष 2023 के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध महोत्सव में भी मधुरेंद्र ने 100 टन (एक लाख किलोग्राम) बालू से 20 फीट ऊंची और 30 फीट लंबी भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा बनाकर सबको चौंका दिया था। इस कलाकृति में “हर घर गंगा जल” और गयाजी डैम का संदेश भी अंकित था। इसे उत्तर भारत की अब तक की सबसे बड़ी रेत प्रतिमा माना गया।मधुरेंद्र कुमार की कला यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है। वर्ष 1999 में मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पैतृक गांव बिजबनी में अरुणा नदी तट पर करीब 2 फीट ऊंची बालू से भगवान बुद्ध की पहली प्रतिमा बनाई थी। ग्रामीणों की सराहना से शुरू हुआ यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुका है।उन्होंने नेपाल, मलेशिया, वियतनाम, नीदरलैंड, भूटान, श्रीलंका, जर्मनी, इटली, रूस, जापान, लाओस, कनाडा, ब्रिटेन, स्कॉटलैंड, अमेरिका सहित भारत के कई राज्यों में अपनी कला का प्रदर्शन किया है। अपनी रेत मूर्तियों के माध्यम से वे पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, सिंगल-यूज प्लास्टिक के खिलाफ अभियान, ‘सेव आवर ओशन’, वन्यजीव संरक्षण, स्वच्छता, नशा मुक्ति, महिला सशक्तिकरण, देशभक्ति, आतंकवाद विरोध, शिक्षा और विश्व शांति जैसे सामाजिक व वैश्विक मुद्दों पर जागरूकता का संदेश देते रहे हैं।बोधगया के इस पावन अवसर पर मधुरेंद्र की कला ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि रेत की नाजुक कणों से भी विश्व शांति और मानवता का मजबूत संदेश दिया जा सकता है।

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