सत्ता की लोलुपता पक्ष विपक्ष की जातिवादी नीति, राष्ट्र गृह युद्ध की दहलीज पर
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Feb 07, 2026
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सामाजिक अश्पृश्यता की मनगढ़ंत कहानियां सत्ता लोलुप राष्ट्र द्रोहियों की देन
वेद पुराण शास्त्रों के तहत कर्म महान पर तथाकथित संविधान के अनुच्छेद में ही छेद
वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में सत्ता की लोलुपता एक प्रमुख विषय है जिस पर अक्सर बहस और विश्लेषण होता है। समकालीन राजनीति, समाज सेवा के आदर्शों से हटकर, केवल सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने पर केंद्रित हो गई है।राजनीति देश और समाज के विकास के लिए होनी चाहिए, लेकिन अब यह केवल सत्ता के लिए होती हैं, सत्ता प्राप्ति स्वयं में एक लक्ष्य बन गई है।लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण सत्ता की लोलुपता के कारण लोकतांत्रिक संस्थानों और मर्यादाओं का उल्लंघन देखा जा रहा है। विधानसभा अध्यक्षों, राज्यपालों की विवादास्पद भूमिका, और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव, पैसा और बाहुबल राजनीति की अपराधीकरण, धन-बल और बाहुबल का उपयोग सत्ता हासिल करने के लिए आम हो गया है। गठबंधन की अस्थिरता केंद्र और राज्य स्तर पर बनी गठबंधन सरकारें अक्सर सत्ता के दबाव और सहयोगियों द्वारा निरंतर दबाव की राजनीति के कारण अस्थिर होती हैं, जो दर्शाता है कि पार्टियां वैचारिक साम्यता से अधिक सत्ता में बने रहने को प्राथमिकता देती हैं। सत्ताधारी दल केंद्रीय जांच एजेंसियों का उपयोग अपने आलोचकों को चुप कराने और विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं, जो सत्ता के केंद्रीकरण की ओर इशारा करता है।कॉर्पोरेट-राजनीति सांठगांठ: राजनीतिक दलों को मिलने वाले भारी चंदे, विशेषकर सत्तारूढ़ दलों को, और व्यापारिक घरानों के साथ संबंध भी सत्ता की इस दौड़ में आर्थिक स्वार्थों को उजागर करता है। भारतीय राजनीति में सत्ता की लोलुपता एक व्यापक समस्या है, जिसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कई पहलुओं को प्रभावित किया है और अक्सर व्यक्तिगत या पार्टीगत हितों को राष्ट्रीय हितों से ऊपर रखा जा रहा है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य गृह युद्ध की दहलीज पर
यदि राष्ट्र की वर्तमान परिदृश्य को देखा जाए तो सत्ता लोलुप नेतृत्व कर्ताओ की वजह से राष्ट्र गृह युद्ध के दहलीज पर खड़ी है। राष्ट्र में सत्तालोलुपता की चाह में तथाकथित नेतृत्व कर्ताओं द्वारा दिन प्रतिदिन सामाजिक समरसता को तार तार कर जाति आधारित कानूनों को बढ़ावा दिया गया और दिया जा रहा है। जिस वजह से राष्ट्र गृह युद्ध की दहलीज पर खड़ी है।
ऐतिहासिक उल्लेख
इस्लामिक शासकों से पहले हलखोर, मेसतर जाति का रामायण, महाभारत सहित किसी भी पुराण, वेद शास्त्र धर्म ग्रंथों में सिकंदर लोदी द्वितीय 1489 से पहले कहीं छुआ छूत की जाती 'चमार' जाति (चंवर बंशिय क्षत्रिय जो कहीं से भी छुआछूत की जाती नही थी को छोड़) साथ ही औरंगजेब की शासन 1658 से पहले दुसाध जाती{मूल रूप से राजस्थान के गहलोत (राजपूत) छुआछूत की जाती नही था को छोड़} का उल्लेख नहीं मिलेगा।
अंग्रेजी काल में समाज में मतभेद
अंग्रेज काल में वेदों को जातिवाद का पोषक घोषित कर दिया गया जिससे बड़ी संख्या में हिन्दू समाज के अभिन्न अंग, जिन्हें दलित समझा जाता है, को आसानी से ईसाई मत में किया गया। केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में गरीब और दलित हिन्दुओं के मन में वेद और ब्राह्मणों के प्रति नफरत भरी गई और यह बताया गया कि आज जो तुम्हारी दुर्दशा है उसमें तुम्हारे धर्म और शासन का ही दोष है। लेकिन ऐसा कहते वक्त वे ये बड़े ही चतुराई से भूल गए कि पिछले 200 साल से तो उनका ही राज है। फिर उसके पूर्व मुगलों का राज था और उससे पूर्व तो बौद्धों का शासन था। और कुछ बुद्धिहीन लोगों ने तथाकथित बातों को मान लिया।
वेद पुराण शास्त्रों के तहत कर्म महान
यजुर्वेद 18.48- रुचं नो धेहि ब्राह्मणेषु रुचं राजसु नस्कृधि। रुचं विश्येषु शूद्रेषु मयि देहि रुचा रुचम्॥
अर्थात- हे परमात्मा आप हमारी रुचि ब्राह्मणों के प्रति उत्पन्न कीजिए, क्षत्रियों के प्रति उत्पन्न कीजिए, वैश्यों के प्रति उत्पन्न कीजिए और शूद्रों के प्रति उत्पन्न कीजिए।
अथर्ववेद 19.32.8- प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च
अर्थात- मुझे ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र और वैश्य सबका प्रिय बनाइये, मैं सबसे प्रेम करने वाला और सबका प्रेम पाने वाला बनूं।
अथर्ववेद 19.62.1- प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु। प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्रे।
अर्थात-- प्रार्थना है कि हे परमात्मा! आप मुझे ब्राह्मणों का, क्षत्रियों का, शूद्रों का और वैश्यों का प्यारा बना दें। इस मंत्र का भावार्थ यह है कि हे परमात्मा! आप मेरा स्वभाव और आचरण ऐसा बना दें जिसके कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और वैश्य सभी मुझे प्यार करें।
अब यहां समझने वाली बात यह है कि यह मंत्रकर्ता कौन था?
स्पष्ट- एक विद्यार्थी यानी ज्ञान लेने की इच्छा रखने वाले ब्राह्मण होते हैं न क्षत्रिय न वैश्य ना ही क्षुद्र होते हैं।
जन्मना जायते शूद्रः कर्मणा द्विज उच्यते।
अर्थात- जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं।
मनुस्मृति 10.65
शूद्रो ब्राह्मणतां एति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् । क्षत्रियाज्जातं एवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च
अर्थात- ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है | इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं |
कूर्मपुराण अध्याय 19.।
कूर्म पुराण में शुद्र के वेदों का विद्वान बनने का वर्णन इस प्रकार से मिलता है। वत्सर के नैध्रुव तथा रेभ्य दो पुत्र हुए तथा रेभ्य वेदों के पारंगत विद्वान शुद्र पुत्र हुए।
कौन-कौन से लोग कर्म के अनुसार क्या बने एक नजर
1- ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे, परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की । ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है।
2- ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे जुआरी और हीन चरित्र भी थे परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये, ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया। (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19)
3- सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए।
4- राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया । (विष्णु पुराण 4.1.14)
5- राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए। पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया । (विष्णु पुराण 4.1.13)
6- धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया, आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण 4.2.2)
7- भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए ।
8- विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने।
9- हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए। (विष्णु पुराण 4.3.5)
10- क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया । (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए। इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं ।
11- मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने।
12- ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना।
13- राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ।
14- त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे।
15- विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया, विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया।
16- विदुर दासी पुत्र थे तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया।
17- वत्स शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी ऋषि बने (ऐतरेय ब्राह्मण 2.19)
संविधान के अनुच्छेद में ही छेद
यदि सच कहा जाए तो भारतीय संविधान को बनाने में डॉक्टर बी एन राव का मुख्य योगदान रहा है और उनके द्वारा संविधान का निर्माण किया गया। पर प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के नाते भीमराव अम्बेडकर द्वारा संविधान के अनुच्छेदों में छेद करते हुए जाति विधान को जोड़ा गया। यदि यह कहा जाए की भारत देश संविधान के तहत चलता है तो यह गलत होगा क्योंकि सभी अनुच्छेदों में छेद करते हुए भीमराव अंबेडकर द्वारा जातिगत कानून ने जोड़ा गया जिसके तहत राष्ट्र जाती विधान पर चलता है। वहीं वर्तमान समय में सत्तालोलुपता की चाह में तथाकथित नेतृत्व कर्ताओं द्वारा और छेद किया गया और किया जा रहा है।
संविधान की अनुच्छेद
जैसे भारतीय संविधान, 1950 अनुच्छेद 15, 16, 17
अनुच्छेद 15- धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है।
अनुच्छेद 16- सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता की गारंटी देता है।
अनुच्छेद 17- अस्पृश्यता का उन्मूलन करता है और किसी भी रूप में इसके आचरण को प्रतिबंधित व दंडनीय अपराध बनाता है।
अनुच्छेद में छेद में ही छेद वर्तमान में जाति विधान को कर रहा शोभित
15(4,5), 16(4) के तहत जाति आधार पर शिक्षण संस्थानों व नौकरियों में विशेष प्रावधान है। इसके अलावा, अनुच्छेद 330, 332,335 के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में जाति के आधार पर सीटों का आरक्षण है। अनुच्छेद 341 और 342 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में परिभाषित करते हैं।
जागो राष्ट्र भक्तों जागो नहीं तो सत्तालोलुपता की चाह में तथाकथित नेतृत्व कर्ताओं द्वारा राष्ट्र को जातिवाद की बीज बो छिन्न-भिन्न कर दिया जाएगा।


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