देहात के नाई शहर में ले चुके बसेरा

दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि रिपोर्ट

दुर्गावती (कैमूर):-- गांव की परंपरा शहरों की एक जिंदगी बन गई है नाई से लेकर कपड़ा धोने वाले धोबी तक शहरों और छोटे-छोटे बाजारों में अपना स्थान बना चुके हैं। आज के समय में बची है तो एकमात्र कृषि जो गांव की एक विरासत है जो किसानों की एक मजबूरी भी है। बेरोजगारी का आलम बढ़ता कृषि का खर्च प्रकृति की मार किसानो की जिंदगी को तवाह कर दिया है। उसी क्रम में हम बात करते हैं ग्रामीण क्षेत्रों में बाल बनाने वाले हजम की अब गांव का हजाम भी कृषि कार्यों से दूर शहर में अपना बसेरा बना लिया है,यदि किसी भी व्यक्ति को बाल कटवाना हो तो उन्हें शहर में जाना पड़ेगा। महंगे खुले शहरों में बैठा वही गांव का नाई महंगे दर पर अपना परिवार चलाने के लिए बाल काटने को मजबूर है। साधारण तौर पर देखा जाए तो छोटे-छोटे बाजारों में बने साधारण सैलून में यदि आप जाएंगे तो₹50 दाढ़ी और 75 से ₹100 बाल कटाने के लिए खर्च आते हैं महंगे सैलून की तो बात ही करना साधारण व्यक्ति के लिए नामुमकिन है। शादी के लिए बहुत मेहनत मान मनऊल के बाद कोई हजाम मिलता है तो वह भी महंगे दर पर भले उन्हें कुछ मिले या न मिले दक्षिण में लेकिन जो ले जाता है उसे देना पड़ता है। आज के समय में ग्रामीण क्षेत्रों में कोई कोई हजाम दिखाई नहीं देता है जो परंपरा को निभा रहा है तो उसकी अवस्था कमजोर हो चुकी है। समय का काल और महंगाई की मार ने बिगड़ते सामाजिक ढांचा को और वातावरण को बिल्कुल बदल डाला। न भाड़े का मकान न महंगा क्रीम और कट जाते थे बाल तथा बन जाती थी दाढ़ियां। सादगी की सफर फैशन में बदल गई और सब कुछ बदल डाला समाज के ढांचे को राजनीतिक परिवेश ने।

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