रोहतास के लेखक-संपादक दम्पती ने 100 वर्ष बाद पुनर्जीवित की राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त की अप्राप्य कृति 'पृथ्वी प्रदक्षिणा'


रोहतास।महान स्वतंत्रता सेनानी 

राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त (28 जून, 1883-24 अप्रैल, 1944) की जयंती के अवसर पर रोहतास जिले के भलुनी धाम निवासी, प्रसिद्ध समाजसेवी, साहित्यकार एवं पर्यावरण संरक्षक स्वर्गीय कन्हैयालाल पंडित के पुत्र *प्रमोद कुमार पांडेय* तथा उनकी पत्नी, लेखिका एवं संपादक सविता पांडेय द्वारा पुनर्संपादित राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त की ऐतिहासिक एवं दुर्लभ कृति 'पृथ्वी प्रदक्षिणा' का शताब्दी संस्करण साहित्यिक-अकादमिक एवं बौद्धिक जगत में विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है।


गुप्तजी की 143 वीं जयंती के अवसर पर संपादक दम्पती ने राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक वक्तव्य में कहा कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, राष्ट्रीय शिक्षा, पत्रकारिता, भारतीय भाषाओं तथा राष्ट्रनिर्माण की संस्थाओं के विकास में उनका योगदान अद्वितीय एवं अविस्मरणीय है। दुर्भाग्यवश आज की पीढ़ी उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व से अपेक्षित रूप से परिचित नहीं है।


उन्होंने बताया कि *'पृथ्वी प्रदक्षिणा'* का प्रथम प्रकाशन वर्ष *1924* में हुआ था। 

 एक शताब्दी बाद इसका पुनर्नवा संस्करण आया है।

 संपादक दम्पती के अनुसार बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने वर्ष *1914 से 1916 के बीच लगभग 21 माह* की विश्वयात्रा कर जापान, चीन, यूरोप, अमेरिका सहित अनेक देशों की शिक्षा, संस्कृति, उद्योग, समाज और शासन-व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन किया। उनका उद्देश्य पर्यटन नहीं, बल्कि विश्व के श्रेष्ठ अनुभवों को भारत के समाज व राष्ट्रनिर्माण में आत्मसात करना था। यही दूरदर्शी दृष्टि *'पृथ्वी प्रदक्षिणा'* को आज भी अत्यंत प्रासंगिक बनाती है।


उन्होंने कहा कि *'ज्ञानमंडल प्रकाशन (1919)*'आज' समाचारपत्र (1920) *'काशी विद्यापीठ' (1921)* तथा *'भारत माता मंदिर' (1936) जैसी ऐतिहासिक संस्थाओं की स्थापना एवं संरक्षण में बाबू शिवप्रसाद गुप्त की अग्रणी भूमिका रही। महात्मा गांधी द्वारा उन्हें प्रदान किया गया 'राष्ट्ररत्न'* संबोधन उनकी असाधारण राष्ट्रसेवा का सशक्त प्रमाण है।


सविता एवं प्रमोद कुमार पांडेय ने कहा कि राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त का जीवन समाज, शिक्षा, पत्रकारिता और राष्ट्रनिर्माण से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए आज भी प्रेरणा और प्रकाश का अक्षय स्रोत है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि *'पृथ्वी प्रदक्षिणा' का शताब्दी संस्करण शोधार्थियों, विद्यार्थियों, इतिहासकारों तथा सामान्य पाठकों को इस महान राष्ट्रनिर्माता के चिंतन और दृष्टि से पुनः परिचित कराएगा।


उन्होंने केंद्र सरकार एवं काशी के सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि राष्ट्रनिर्माण, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदी पत्रकारिता, भारतीय भाषाओं तथा सामाजिक संस्थाओं के निर्माण में उनके अद्वितीय योगदान को देखते हुए राष्ट्ररत्न बाबू शिवप्रसाद गुप्त को *मरणोपरांत 'भारत रत्न'* से सम्मानित किया जाए।


पूर्व केंद्रीय विदेश एवं शिक्षा मंत्री डॉ राजकुमार रंजन सिंह ने संपादक द्वय को बधाई देते हुए कहा है कि

पुनर्प्रकाशन एवं पुनर्संपादन

 केवल एक पुस्तक का पुनर्मुद्रण नहीं, बल्कि भारत के एक महान राष्ट्रनिर्माता की दूरदर्शी वैचारिक विरासत को वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अभियान है।

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार-लेखक-संपादक एवं राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश एवं परमवीर चक्र से सम्मानित करगिल युद्ध के महानायक कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव एवं अनेक राष्ट्रीय व्यक्तित्वों ने भी पृथ्वी प्रदक्षिणा के शताब्दी संस्करण को सराहा है एवं बधाई दी है।

बिहार एवं रोहतास के बुद्धिजीवियों ने भी इसे व्यापक तौर पर सराहा है।

रिपोर्टर

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