मानसून झूम के बरस तेरा स्वागत अभिनंदन


रोहतास। जिले में वर्षा ऋतु के आते ही जहां खरीफ की बुआई का शुभारंभ हो गया है। वहीं झमाझम बारिश से किसानों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा है। इस संबंध में काशी काव्य संगम रोहतास के जिला संयोजक साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास ने बताते हैं कि वर्षा ऋतु तृष्णाओं का तृप्त गीत है।उस अदृश्य शक्ति के प्रांगण में प्रकृति का मंगलाचरण है।अनन्त सत्ताओं, तारा मंडलों और नीहारिकाओं को चित्रित करने वाले उन परम हाथों द्वारा किया जाने वाले यह वार्षिक जलाभिषेक पृथ्वी को दिया गया परमात्मा का आशीर्वाद है। भूमि के गर्भ में छिपे असंख्य बीज अंकुरण की किलकारियों से धरती की कोख को हरा करते हैं, कीट-पतंगे, जीव-जन्तु काम के परासंकेतों पर वर्षा ऋतु के संगीत की जीवंत रचना करते हैं, पृथ्वी की दशों दिशायें जल तरंगों की इस ताल पर नृत्य की भंगिमा भरती हैं।

मनुष्य प्रकृति का उत्सव प्रतिनिधि है।हमारे मनीषियों ने चतुर्मास में आन्तरिक यात्राओं का आग्रह किया है।पुराने समय की कठिन परिस्थितियों में समुद्र एक भय था। वर्षा ऋतु में समुद्र का रूप धारण करती नदियां, नाले, तालाब व्यक्ति के आवागमन को बाधित करते थे, तभी तो संयम-व्रत के प्रावधान वर्षा ऋतु में औषधियों की तरह काम करते रहे हैं। वर्षा ऋतु के जल की तरह यदि मन की बाढ़ को नियंत्रित किया जाये, आत्म नियन्त्रण की डोरियों द्वारा प्राकृतिक नियमों से बंधा जाय, सुपाच्य मौसमी सब्जियों का सेवन हो, तो वर्षा ऋतु जीवन को सावन के झूले की सबसे ऊँची पेंग बना सकती है।

पहाड़ी जीवन में वर्षा ऋतु कोहरे की घनी चादर के बीच घुघुति के दर्दीले स्वर सुन के रिमझिम रोती है। एक हाथ में गोसे का धुंआ और दूसरे हाथ में थेगड़ी लगा बांस के हत्थे वाला छाता, कीसे में अल्पाहार के उस गोपालक का कठिन जीवन कभी मोहक भी लगता है। कोहरे के फायदा उठाकर पशुधन पर लालची निगाह लगाए तेंदुवे को रोहतास गढ़ में बिल्ली की तरह हट-हट कर भगाते थे। करैं पक्षी की आवाज अलार्म का काम करती थी। एकाकीपन में उन पहाड़ों की लोक ऋचाएं हैं। उसी पीड़ा से अभिमन्त्रित पहाड़ की लेखनी इस उपेक्षित भू-खण्ड को परिभाषित करती रही है। वर्षा ऋतु सुनील कुमार रोहतास की प्रिय ऋतु लगती है। उन्होंने वर्षा ऋतु पर मूसलाधार लिखा है।

आकाशीय जल और फसल चक्र के आपसी संबंध से मानव ने ऋतु के वर्तुल को समझा, समुद्र, नदियां हिम शिखर, पर्जन्य।अर्थात् पानी अपने प्रत्येक रूप मे पूजा जाने लगा और जल हमारे जीवन का पर्यायवाची बन गया। गोमुख जैसे तीर्थों के श्रीगणेश रचे गये। परन्तु विज्ञान की तीसरी आंख ने जल को औजार बनाकर जब इस उपभोक्ता संस्कृति की नींव रखी, दोहन और भोग की अंधी दौड़ में जल को ही नाव बनाया गया तो जल चक्र का समीकरण अपाहिज हो गया। प्राकृत दोलनों सेे की गयी छेड़छाड़ के कारण वर्षा विभीषिका बन गयी, बाढ़-चक्रवात, सूखा, अतिवृष्टि हमारी भोगवृति से उपजे शब्द हैं। यदि हम आज भी छत से टपकती बूंदों का राग समझ लें, बादलों से उसका गन्तव्य और कोहरे से उनका मन्तव्य न छीनें तो वे महान हाथ प्रत्येक क्षण सतरंगे इन्द्रधनुष की प्रत्यंचा खींचने को तैयार बैठे हैं।

आइये! रंग-बिरंगा छाता लेकर गीली सड़क पर वर्षा ऋतु को गुनगुनायें, सूर्य और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करें।सावन-भादों की वह झड़ी आंसुओं की निषेधात्मक तुलना नहीं बल्कि तृप्त आत्मा का आनन्द गीत है। समुद्र की अतल गहराइयों और आकाश की अनन्त ऊँचाइयों की यात्राओं के लिखित वृतान्त वर्षा की प्रत्येक बूंद के पृष्ठ पर पढ़े जा सकते हैं। चलिये बादलों के पीछ छिपेे हुये मार्तण्ड को अंजुलि भर अर्घ्य देकर उस नियन्ता की करूणा से कृतार्थ करें।उसका स्मरण करें।जैसे ही मानसून ने दस्तक दी तो रँग-बिरँगे छाते भी बाहर आ गए ! "आजा, मेरी छतरी के नीचे" यह एक ऐसा सुन्दर गीत-मुहावरा है जिसका इस्तेमाल आजकल बहुत आम है, इसका मतलब है एक ही छत के नीचे। और यह एकीकरण का प्रतीक है। छाते मूल रूप से हमें बारिश और गर्मी से बचाने के इरादे से बनाए गयें हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम अपने प्रियजनों को मुसीबतों से, कष्टों से और जीवन के झंझावातों से बचाते हैं।


यूँ तो छाते पूरे साल घर में किसी सुरक्षित स्थान रख दिए जाते हैं और उन्हें सिर्फ़ बारिश के मौसम में ही याद किया जाता है। इसलिए खोलते समय वे कई बार जाम हो जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे हम उन लोगों के साथ सामान्य रहना मुश्किल समझते हैं जिनसे हम कभी कभी या बहुत देर बाद मिलतें हैं अथवा जिनसे हमारे थोड़े बहुत मतभेद होते हैं।


ऐसे मामलों में छातों में तेल डालकर खोलने और बंद करने की क्रिया से उन्हें सुगम बनाया जाता है। अगर मतभेद के बावजूद भी प्रेम और स्नेह एक जैसा बना रहे, तो यह तेल की तरह काम करता है और संवाद को सुगम बनाता है। इसके लिए जीवन में बहुत परिपक्वता की आवश्यकता होती है।


_आजकल हम बाज़ार की सडकों पर देखतें हैं कि बहुत सुन्दर, नये और फैंसी विभिन्न रंगों वाले आकर्षक छाते विक्रय के लिए किसी मोड़ पर या पार्किंग प्लेस पर रखे रहतें हैं, तो हमें उनकी ओर सहसा ही आकर्षित होतें हैं और पुराने छातों को त्यागने का मन करता है। लेकिन पुराने छाते के साथ बिताए पलों के बारे में सोचना, जब इसने हमें बारिश के तीव्र और मूसलाधार तूफ़ानों से बचाया था और इसके होने से हमको जो सुरक्षा का एहसास हुआ था, वह इसे त्यागने के विचार के लिए बहुत भारी हो जाता है। हम इंसानों के साथ भी ऐसा ही है। हम नए लोगों से मिलते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम पुराने लोगों से अपने संबंध तोड़ देंतें हैं। साथ में बिताए कुछ अद्भुत यादगार पलों की यादें हमें उनसे मुंह मोड़ने से रोकती हैं। और हम उन सम्बन्धो को भी सँजोये रहतें हैं।_


मुझे उम्मीद है कि अगली बार जब भी हम अपने छाते का उपयोग करेंगे, तो हमारा नज़रिया और अहसास अलग होगा!


_हाँ! मॉनसून आ गया है और अपने साथ चिलचिलाती धूप से बड़ी राहत लेकर आया है।_


ऐसी बारिश जो पुरानी यादें ताज़ा कर दे, ऐसी बारिश जो अलग-अलग मूड के साथ आती है।


कभी ज़ोरदार बारिश, जिसका शोर बाकी सारी आवाज़ों को दबा देता है।

तो कभी एक संगीतमय लय के साथ बूंद-बूंद गिरती बारिश, जो मन को खुश कर देती है। कभी गीली सड़कों, गीली छतों और पानी के गड्ढों को पीछे छोड़ते हुए गायब हो जाती है, और फिर अचानक तेज़ बौछार के साथ लौट आती है।


 बारिश के अपने मूड होते हैं और हमारे मूड को बदलने की ताकत भी।


अब तो बादल मानों आशा लेकर साथ आने लगें हैं और हम आसमान में बादल देखकर बरसात की उम्मीद करने लग जातें हैं!बर्षा ऋतु खरीफ फसलों की जान है जहान है।


_एक लम्हे को तेरी सम्त से उठा बादल_

और बारिश की सी उम्मीद लगा ली मैंने।

     बर्षा ऋतु खरीफ फसलों के लिए वरदान है।

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