आडंबरों से बचकर मनाएं पर्व त्योंहारों को
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Nov 07, 2026
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अखिल भारतीय समाचार टीम
बिहार-------- काशी काव्य संगम रोहतास के जिला संयोजक कवि सह साहित्यकार सुनील ने बताया कि पर्वों को धूमधाम से मनाएं लेकिन आडंबरों से बचना चाहिए। त्यौहार शब्द सुनते ही मन में एक चित्र उभरता है। घर में दीपक जल रहे हैं, आँगन में रंगोली सजी है, रसोई से पकवानों की खुशबू आ रही है, बच्चे नए कपड़े पहनकर हँस रहे हैं, बड़े बुजुर्ग आशीर्वाद दे रहे हैं, पड़ोसी मिठाई लेकर आ रहा है, और पूरा मोहल्ला एक ही रंग में रंगा हुआ लगता है। दीपावली त्यौहारों का अर्थ ही यही है, मिलना, जुड़ना, बाँटना, मनाना।
भारतीय संस्कृति में त्यौहार केवल छुट्टी का दिन नहीं है। वह जीवन का उत्सव है। वह कृषि से जुड़ा है, ऋतु से जुड़ा है, धर्म से जुड़ा है, इतिहास से जुड़ा है, परिवार से जुड़ा है और समाज से जुड़ा है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, ईद, क्रिसमस, पोंगल, ओणम, बैसाखी, छठ, नवरात्रि, दशहरा, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, मकर संक्रांति, लोहड़ी, गुरुपर्व, महावीर जयंती, बुद्ध पूर्णिमा, हर त्यौहार के पीछे कोई न कोई कथा है, कोई संदेश है, कोई मूल्य है। उन कथाओं पर लोक कथा चरण कथा भारत कथा सारे का जोड़ मिलकर हमेशा ऐसा कुछ दिन जाता है जिस पर तरह-तरह की चर्चाएं निकल आती है।
दीपावली हमें बताती है कि अंधकार पर प्रकाश की जीत होती है। होली बताती है कि प्रेम और समानता से बड़े कोई रंग नहीं। रक्षाबंधन बताता है कि भाई बहन का रिश्ता रक्षा का वचन है। ईद बताती है कि रोज़े और त्याग के बाद बाँटने में ही असली खुशी है। क्रिसमस बताता है कि सेवा और करुणा ही सबसे बड़ा उपहार है। छठ बताता है कि प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति कृतज्ञता ही पूजा है।
लेकिन आज प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे त्यौहार वैसे ही रह गए हैं जैसे थे? क्या उनमें वही सादगी, वही प्रेम, वही अपनापन बचा है? या त्यौहार अब धीरे धीरे आडंबर का प्रदर्शन बन गए हैं? क्या हम त्यौहार मना रहे हैं या त्यौहार का दिखावा कर रहे हैं? क्या हम खुशी बाँट रहे हैं या अपनी अमीरी दिखा रहे हैं? मैं क्या हूं यह दिखाने का प्रदर्शन कर रहे हैं,यही इस आलेख का केंद्रीय प्रश्न है।
आडंबर का अर्थ है दिखावा, बाहरी चमक दमक, अनावश्यक खर्च, बनावटीपन, और असली भावना से दूर हो जाना। जब त्यौहार में भावना से अधिक प्रदर्शन होने लगे, जब पूजा से अधिक फोटो खिंचवाने की चिंता होने लगे, जब प्रसाद से अधिक ब्रांड की चिंता होने लगे, जब मिलन से अधिक स्टेटस की चिंता होने लगे, तब समझना चाहिए कि त्यौहार में आडंबर घुस गया है।
इस आलेख में हम विस्तार से समझेंगे कि त्यौहार में आडंबर क्या है, वह क्यों बढ़ा, उसके रूप क्या हैं, उसके कारण क्या हैं, उसके दुष्परिणाम क्या हैं, और उससे कैसे बचा जा सकता है। हम इतिहास, समाज, अर्थव्यवस्था, मनोविज्ञान, पर्यावरण, धर्म और परिवार, सभी कोणों से इस विषय को देखेंगे।
पुराने समय में त्यौहार कैसे मनाए जाते थे, यह जानने के लिए हमें बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। अपने दादा दादी, नाना नानी से पूछिए। वे बताएँगे कि दीपावली पर घर में मिट्टी के दीये जलते थे। माँ अपने हाथ से दीये बनाती थी, या कुम्हार से खरीदकर लाती थी। तेल और रुई की बाती से दीये जलते थे। घर की सफाई पूरा परिवार मिलकर करता था। नए कपड़े साल में एक या दो बार ही आते थे, और त्यौहार पर नया कपड़ा मिलना ही सबसे बड़ी खुशी होती थी। पिता सामूहिक रूप से जूते चप्पल कपड़े खरीद कर लाते थे। मां अपने पास रख कम से कम पैसे में अधिक से अधिक ऐसा कुछ व्यंजन बनाने में लग जाती थी जो सभी के लिए एक समान हो।
मिठाई घर में बनती थी। गुजिया, लड्डू, खीर, पूड़ी, हलवा, यही पकवान थे। बाजार से बहुत कम चीजें आती थीं। पड़ोस में मिठाई बाँटी जाती थी। जिसके घर में जो बना, वह सबमें बँटता था। गरीब और अमीर का भेद त्यौहार के दिन मिट जाता था। सब एक पंक्ति में बैठकर खाते थे। गांव में खासकर दीपावली के दिन सभी एक दूसरे के घर जाते थे। बच्चे उधम मचाते हुए एक दूसरे के घर जाते थे ।उसे घर के बड़े बूढ़े उन्हें आशीर्वाद देते थे साथ ही उन्हें घर के बने हुए पकवान खाने को देते थे।
होली पर रंग घर के ही होते थे। टेसू के फूलों से रंग बनता था। गुलाल हाथ से बनता था। कोई महँगा रंग नहीं, कोई हानिकारक केमिकल नहीं। सब एक दूसरे को रंग लगाते थे, गले मिलते थे, गुझिया खाते थे, पुरानी दुश्मनी भूल जाते थे। तुम बाजार में ऐसे पेंट आ गए हैं। जिसको लगाने में 5 मिनट जगह नहीं लगता लोग नीले पीले हो जाते हैं ।लेकिन उसे चेहरे से उतारने में घंटा लग जाते हैं।
ईद पर सेवइयाँ घर में बनती थीं। पूरा मोहल्ला एक दूसरे के घर जाता था। गले मिलना ही ईदी थी। नए कपड़े न भी हों तो भी कोई शर्म नहीं थी। साफ कपड़े ही नए लगते थे।
छठ पर तो सादगी ही पूजा थी। मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनता था। बाँस की टोकरी में फल और ठेकुआ होता था। नदी किनारे पूरा परिवार जाता था। कोई दिखावा नहीं, कोई मंच नहीं, कोई लाउडस्पीकर नहीं। केवल श्रद्धा थी।
उन त्यौहारों में पैसा कम लगता था, पर आनंद बहुत मिलता था। क्योंकि आनंद चीजों में नहीं, लोगों में था। आनंद दिखावे में नहीं, भावना में था। आनंद फोटो में नहीं, यादों में था।
आज स्थिति उलट गई है। पैसा बहुत लगता है, पर आनंद कम मिलता है। चीजें बहुत हैं, पर संतोष कम है। फोटो बहुत हैं, पर यादें कम हैं।
आडंबर का सरल अर्थ है, जो अंदर नहीं है, उसे बाहर दिखाना। जो भावना नहीं है, उसे प्रदर्शन से ढकना। जो सामर्थ्य नहीं है, उससे अधिक खर्च करना ताकि लोग हमें बड़ा समझें। बड़े बनने की चाहत में बहुत सारे कर्म किए जाते हैं जिससे यह प्रदर्शित हो जाता है तो उससे बड़ा कोई नहीं पैसे की खनक से लोग मुझे बताना चाहते हैं कि वह संसार में सबसे बड़े हैं उनके पास सब कुछ है।
त्यौहार में आडंबर धीरे धीरे घुसा। पहले वह शहरों में आया, फिर गाँवों में फैला। पहले वह अमीरों में था, फिर मध्यम वर्ग में आया, अब वह गरीबों को भी अपनी चपेट में ले रहा है।
इसके कई रूप हैं, आइए उन्हें एक एक करके समझते हैं
पहले त्यौहार पर एक नया कुर्ता या साड़ी ही काफी थी। अब हर त्यौहार पर नया डिजाइनर कपड़ा चाहिए, ब्रांडेड कपड़ा चाहिए, महँगा लहँगा चाहिए, महँगा शेरवानी चाहिए। एक ही त्यौहार में तीन तीन बार कपड़े बदलना फैशन बन गया है। सोशल मीडिया पर फोटो डालने के लिए कपड़े खरीदे जाते हैं। कपड़ा पहनने के लिए नहीं, दिखाने के लिए खरीदा जाता है।
गहनों का भी यही हाल है। सोने के गहने अब श्रद्धा के लिए नहीं, दिखावे के लिए पहने जाते हैं। कौन कितना सोना पहनेगा, इसकी होड़ लगती है।
पहले घर की सफाई ही सजावट थी। गोबर से लीपा आँगन, मिट्टी के दीये, आम के पत्तों का तोरण, यही सजावट थी। अब घर की सजावट एक इवेंट बन गई है। इंटीरियर डिजाइनर बुलाए जाते हैं। लाखों रुपये की लाइटिंग होती है। विदेश से फूल मँगाए जाते हैं। थीम डेकोरेशन होता है। पड़ोसी से अच्छा घर सजाना ही लक्ष्य बन गया है।
दीपावली पर मिट्टी के दीये की जगह अब चीनी लाइटें, एलईडी झालरें, महँगे झूमर आ गए हैं। दीये की लौ में जो शांति थी, वह झालर की चमक में नहीं है।
पहले घर की मिठाई ही सबसे अच्छी लगती थी। अब मिठाई भी ब्रांड से आती है। किलो के हिसाब से नहीं, डिब्बे के डिजाइन के हिसाब से मिठाई खरीदी जाती है। ड्राई फ्रूट्स के महँगे डिब्बे, चॉकलेट के इंपोर्टेड पैकेट, महँगी वाइन की बोतलें, ये सब त्यौहार का हिस्सा बन गए हैं।
भोजन में भी दिखावा है। घर का खाना छोड़कर होटल में पार्टी, बुफे में पचास तरह के व्यंजन, आधा खाना फेंक देना, यही आधुनिक त्यौहार बन गया है।
दीपावली पर पटाखों का आडंबर सबसे अधिक दिखता है। पहले एक छोटी सी फुलझड़ी ही खुशी दे देती थी। अब हजारों, लाखों रुपये के पटाखे फोड़े जाते हैं। कौन कितना बड़ा धमाका करेगा, इसकी होड़ लगती है। इससे प्रदूषण बढ़ता है, बुजुर्गों, बच्चों, जानवरों और बीमार लोगों को तकलीफ होती है, पर दिखावे के आगे कोई नहीं सोचता। अब तो दिखावे की इतनी होड़ लगी है की एक व्यक्ति कभी ₹50 की मिठाई नहीं खरीदता था लेकिन आज वह ₹500 की मिठाई खरीद कर दोस्त के पास जाता है और वहां 2 मिनट नहीं रुकता वापस चला आता है।
होली, शादी, त्यौहार, सबमें डीजे, लाउडस्पीकर, तेज आवाज का आडंबर है भक्ति संगीत की जगह शोर ने ले ली है
यह सबसे नया और सबसे खतरनाक आडंबर है। त्यौहार मनाने से पहले फोटो खिंचवाना, रील बनाना, स्टेटस डालना, लाइव आना, यही मुख्य काम हो गया है। पूजा के कार्यक्रम में पंडित को पंडित का कार्य करने से मना करते हुए उसे थोड़ा रोकने को कहा जाता है क्योंकि फोटो सेशन ज्यादा जरूरी हो गया है।पूजा अधूरी रह जाए, चलेगा, पर फोटो अच्छी आनी चाहिए। प्रसाद बँटे या न बँटे, पर इंस्टाग्राम पर पोस्ट जरूर आनी चाहिए।
लोग त्यौहार अपने लिए नहीं, दूसरों को दिखाने के लिए मनाते हैं। लाइक और कमेंट ही खुशी का पैमाना बन गए हैं। अगर फोटो पर लाइक कम आए तो त्यौहार फीका लगने लगता है। यह मानसिक गुलामी है। सोशल मीडिया के हो जाने के बाद मानसिक गुलामी में हम दिन पर हम दिन पर दिन जुड़ते जा रहे हैं परंतु इस पर हम गंभीरता से नहीं सोचते।
दान तो गुप्त होना चाहिए। हमारे शास्त्र कहते हैं, दान ऐसे दो कि एक हाथ को दूसरे हाथ को पता न चले। पर अब दान भी दिखावे का साधन बन गया है। बड़े बड़े चेक, बड़ी बड़ी होर्डिंग, नाम के साथ फोटो, मंच पर सम्मान, यही दान बन गया है। मंदिर में सोने का मुकुट चढ़ाना, पर बाहर बैठे भूखे को खाना न देना, यही आडंबर है। अखबारों में त्योहार के अवसर पर हर पन्ना बधाई संदेश से विज्ञापन से खरीद बिक्री के संदेशों से भरा रहता है।₹50 से लेकर 50 लाख तक का विज्ञापन सामान खरीदने को लेकर अखबारों में रहता है और अखबार पढ़ने के बाद विज्ञापन पढ़ने के बाद लोग खरीदारी भी करते हैं जरूरत हो या ना हो फिर भी त्यौहार पर अधिक से अधिक खरीदारी करने की होड़ लगी रहती है। बैंक वाले ब्याज पर पैसे अधिक अधिक देते हैं जिससे लोग ना चाहते हुए भी अपने घर में दिखाने के लिए खाने का सामान कपड़े का सामान गहने खरीदने लगते हैं।पंडालों और आयोजनों में भी चंदे का दिखावा है। कौन कितना चंदा देगा, उसका नाम कितनी बार बोला जाएगा, यही प्रतिष्ठा बन गई है।
आडंबर अचानक नहीं बढ़ा इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं
बाजार ने त्यौहार को एक उत्पाद बना दिया है। हर त्यौहार से एक महीने पहले विज्ञापन शुरू हो जाते हैं। यह खरीदो, वह खरीदो, नहीं खरीदोगे तो त्यौहार अधूरा है। कंपनियाँ हमें यह विश्वास दिलाती हैं कि खुशी खरीदी जा सकती है। हम भूल जाते हैं कि खुशी खरीदी नहीं, महसूस की जाती है। बाजार ने त्यौहार को सेल का मौसम बना दिया है।
पहले लोग अपने पड़ोसी के साथ प्रेम करते थे। अब लोग अपने पड़ोसी से तुलना करते हैं। उसके घर में इतनी लाइटें लगीं, तो मेरे घर में उससे अधिक लगेंगी। उसने इतने का गिफ्ट दिया, तो मैं उससे महँगा दूँगा। यह तुलना कभी समाप्त नहीं होती। तुलना ही आडंबर की जननी है।
सोशल मीडिया ने दिखावे को एक नशा बना दिया है। हर व्यक्ति को लगता है कि वह एक सेलिब्रिटी है और उसे अपनी जिंदगी का प्रदर्शन करना है। अगर कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर नहीं है कुछ दिन के लिए कुछ घंटे के लिए नदारत है तो उसके दोस्त फोन करके उससे पूछते हैं क्या बात है सब ठीक-ठाक तो है। यह एक अच्छी चीज समाज में आई है। लोग सोशल मीडिया से हाल-चाल लेने लगे हैं क्योंकि आना-जाना बच गया आने जाने का खर्च बच गया आने जाने का समय बच गया। त्यौहार पर इस प्रदर्शन का सबसे अच्छा अवसर है। लोग वास्तविक जीवन से अधिक वर्चुअल जीवन में जीने लगे हैं।
जब हम अपनी परंपरा का अर्थ भूल जाते हैं, तब हम उसके रूप को ही पकड़ लेते हैं। हमें नहीं पता कि दीपावली क्यों मनाई जाती है, हमें केवल पता है कि दीपावली पर शॉपिंग करनी है। हमें नहीं पता कि छठ क्यों किया जाता है, हमें केवल पता है कि छठ पर घाट पर जाना है। अर्थ भूलने पर रूप ही आडंबर बन जाता है। त्यौहार क्यों मनाया जाता है इसके मूल में क्या है इस पर अब नहीं विचार किया जा रहा है ना इस बारे में कोई किसी को कुछ बताता है। रामलीला देखना लोगों ने पसंद किया लेकिन राम कौन बना है कैसा लगता है यह देखना उन्हें ज्यादा पसंद है सीता कितनी सुंदर थी सीता ने कौन से वस्त्र पहने थे वह वस्त्र कौन से दुकान के थे वह गहने कौन से थे। किस जगह से लिए गए थे यह जानने की जिज्ञासा लोगों के मन में है।
पहले संयुक्त परिवार में त्यौहार मनाया जाता था। दादी, चाचा, ताऊ, सब मिलकर काम करते थे। खर्च बँट जाता था, काम बँट जाता था, आनंद बँट जाता था। अब एकल परिवार में सब कुछ अकेले करना पड़ता है। अकेलापन दूर करने के लिए लोग चीजों का सहारा लेते हैं। चीजें ही आडंबर बन जाती हैं।
आज समाज में व्यक्ति की इज्जत उसके संस्कार से नहीं, उसके पैसे से मापी जाती है। त्यौहार इस पैसे को दिखाने का सबसे अच्छा मौका है। इसलिए लोग त्यौहार पर अपनी सफलता का प्रदर्शन करते हैं।
आडंबर केवल पैसे की बर्बादी ही नहीं, उसके दूरगामी दुष्परिणाम हैं
त्यौहार के नाम पर लाखों परिवार कर्ज में डूब जाते हैं। क्रेडिट कार्ड, ईएमआई, उधार, साहूकार से कर्ज, सब त्यौहार के लिए लिया जाता है। दीपावली के बाद कई परिवार महीनों तक कर्ज चुकाते हैं। गरीब व्यक्ति भी दिखावे के लिए कर्ज लेता है, ताकि समाज में उसकी इज्जत बनी रहे। यह आर्थिक गुलामी है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में त्यौहारों के मौसम में खर्च हर वर्ष बढ़ रहा है, पर बचत घट रही है। लोग अपनी साल भर की बचत एक ही त्यौहार में उड़ा देते हैं।
आडंबर तनाव पैदा करता है। त्यौहार से पहले ही तनाव शुरू हो जाता है। क्या पहनूँगा, क्या खिलाऊँगा, लोग क्या कहेंगे, यही चिंता रहती है। त्यौहार आनंद के लिए होता है, पर वह चिंता का कारण बन जाता है। बच्चे भी इस तनाव से नहीं बचते। उन्हें लगता है कि अगर उनके पास महँगे कपड़े नहीं हैं, तो वे छोटे हैं। यह हीन भावना बचपन से ही घर कर जाती है।
आडंबर समाज में असमानता बढ़ाता है। अमीर और गरीब के बीच की खाई त्यौहार पर सबसे अधिक दिखती है। गरीब बच्चा जब अमीर बच्चे के महँगे पटाखे देखता है, तो उसके मन में दुख होता है। त्यौहार जो जोड़ने के लिए था, वह तोड़ने लगता है।
त्यौहार पर परिवार में झगड़े भी आडंबर के कारण होते हैं। किसके घर जाएँगे, कितना खर्च करेंगे, किसको कितना गिफ्ट देंगे, इन्हीं बातों पर झगड़े होते हैं। सास बहू, पति पत्नी, भाई भाई, सबमें तनाव बढ़ता है।
पर्यावरणीय दुष्परिणाम
पटाखों से वायु प्रदूषण, प्लास्टिक की सजावट से कचरा, महँगे फूलों की बर्बादी, खाने की बर्बादी, पानी की बर्बादी, बिजली की बर्बादी, ये सब पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। दीपावली के अगले दिन दिल्ली जैसे शहरों में साँस लेना मुश्किल हो जाता है। होली पर पानी की बर्बादी, गणेश विसर्जन पर प्लास्टिक की मूर्तियों से नदी का प्रदूषण, ये सब आडंबर का ही परिणाम है।
जब त्यौहार में आडंबर बढ़ता है, तब धर्म का मूल संदेश खो जाता है। पूजा एक रस्म बन जाती है। मंत्रों का अर्थ कोई नहीं जानता। बस फोटो खिंचवाना ही पूजा बन जाती है। धर्म दिखावे का साधन बन जाता है।
बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। अगर वे देखते हैं कि त्यौहार का अर्थ महँगे कपड़े, महँगे गिफ्ट, महँगे पटाखे हैं, तो वे यही सीखेंगे। वे सादगी, प्रेम, त्याग, सेवा का मूल्य नहीं सीख पाएँगे। यही आने वाली पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
हमारे शास्त्रों में बार बार कहा गया है कि आडंबर धर्म नहीं है। गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति दिखावे के लिए पूजा करता है, वह मुझे प्राप्त नहीं करता। कबीर कहते हैं, माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर। अर्थात माला फेरने से कुछ नहीं होगा, मन को फेरना होगा।
तुलसीदास जी कहते हैं, निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा। अर्थात निर्मल मन वाला ही मुझे पाता है, मुझे कपट और छल पसंद नहीं।
सिख गुरुओं ने लंगर की परंपरा दी, जहाँ अमीर गरीब एक साथ बैठकर खाते हैं। यही सादगी का सबसे बड़ा उदाहरण है।
इस्लाम में जकात और फितरा का सिद्धांत है कि त्यौहार से पहले गरीबों को दो, ताकि वे भी त्यौहार मना सकें। ईद का अर्थ ही बाँटना है।
ईसाई धर्म में कहा गया है कि अपना खजाना स्वर्ग में जमा करो, जहाँ चोर चुरा नहीं सकते। अर्थात दिखावे में धन खर्च मत करो, सेवा में खर्च करो।
सभी धर्मों का सार एक ही है, सादगी, प्रेम, सेवा, त्याग आडंबर किसी भी धर्म में नहीं है
केवल समस्या बताना पर्याप्त नहीं है। समाधान भी बताना आवश्यक है। यहाँ कुछ व्यावहारिक उपाय दिए जा रहे हैं, जिन्हें हर परिवार अपना सकता है।
त्यौहार से पहले बजट बनाएँ। तय करें कि कितना खर्च करना है। उससे अधिक खर्च न करें। कर्ज लेकर त्यौहार कभी न मनाएँ। याद रखें, त्यौहार एक दिन का है, कर्ज महीनों का है।
सादगी अपनाएँ
मिट्टी के दीये जलाएँ। घर की बनी मिठाई बनाएँ। घर की सजावट घर के सामान से करें। बच्चों को सादगी का महत्व समझाएँ। सादगी में ही असली सुंदरता है।
सोशल मीडिया से दूरी
त्यौहार के दिन कम से कम एक दो घंटे फोन से दूर रहें। पूजा के समय फोन बंद रखें। फोटो के लिए नहीं, यादों के लिए त्यौहार मनाएँ। एक अच्छी फोटो से अधिक एक अच्छी याद महत्वपूर्ण है।
बाँटने की आदत
त्यौहार पर अपने से कमजोर की सहायता करें। गरीब बच्चे को कपड़े दें, भूखे को खाना खिलाएँ, अनाथ आश्रम में जाएँ, वृद्धाश्रम में जाएँ। जब आप किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, तब असली त्यौहार मनता है। असली खुशी असली त्यौहार यही है कि जिनके चेहरे पर पूरे साल मुस्कान नहीं आती। उनके चेहरे पर आपके छोटे से गिफ्ट छोटे से उपहार से उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाए।
पर्यावरण का ध्यान
पटाखे कम जलाएँ या न जलाएँ। मिट्टी की मूर्ति का उपयोग करें। प्लास्टिक की सजावट से बचें। पानी बचाएँ। खाना बर्बाद न करें। प्रकृति के साथ त्यौहार मनाएँ, प्रकृति के विरुद्ध नहीं।
परिवार को समय दें
त्यौहार का सबसे बड़ा उपहार समय है। बच्चों के साथ बैठें, बुजुर्गों की कहानी सुनें, एक साथ खाना बनाएँ, एक साथ खाएँ। यही यादें जीवन भर रहेंगी। महँगे गिफ्ट भूल जाएँगे, पर साथ बिताया समय कभी नहीं भूलेंगे। त्योहार के अवसर पर लोग पहले घर जाते थे नहीं अपने गांव जाते थे नहीं यह तो समय का आकलन है पर देखने में यहां आता है त्योहारों पर रेलगाड़िया में बसों में लोग जगह न मिलने पर भी खड़े होकर चलना पसंद कर रहे हैं।
बच्चों को बताएँ कि यह त्यौहार क्यों मनाया जाता है। राम कथा सुनाएँ, कृष्ण कथा सुनाएँ, छठ की कथा सुनाएँ। जब बच्चों को अर्थ पता होगा, तब वे रूप के पीछे नहीं भागेंगे।
दूसरों से तुलना करना बंद करें। आपके पास जो है, उसी में खुश रहें। पड़ोसी का घर कितना सजा है, इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि आपका घर कितना प्रेम से भरा है।
कल्पना कीजिए, एक ऐसा त्यौहार जहाँ सुबह उठकर सबने मिलकर घर साफ किया। माँ ने घर में ही पकवान बनाए। पिता ने बच्चों को त्यौहार की कहानी सुनाई। पड़ोस में मिठाई बाँटी गई। शाम को सबने मिलकर दीये जलाए। कोई बड़ा शोर नहीं, कोई बड़ा खर्च नहीं, पर सबके चेहरे पर मुस्कान थी। गरीब पड़ोसी को भी नए कपड़े दिए गए। एक गरीब बच्चे को भी पटाखे नहीं, किताबें दी गईं। रात को सब एक साथ बैठकर खाना खाया, हँसे, बातें कीं। यही आदर्श त्यौहार है।
ऐसा त्यौहार मनाना कठिन नहीं है। बस हमें अपनी सोच बदलनी है। हमें यह समझना है कि त्यौहार चीजों का नहीं, लोगों का है। त्यौहार दिखावे का नहीं, भावना का है। त्यौहार खर्च का नहीं, प्रेम का है।
त्यौहार हमारी संस्कृति की आत्मा हैं। अगर आत्मा में ही आडंबर घुस गया, तो संस्कृति खोखली हो जाएगी। आज हमें आवश्यकता है कि हम त्यौहारों को फिर से सादा, सरल, प्रेमपूर्ण और अर्थपूर्ण बनाएँ।
आडंबर को छोड़ना कोई गरीबी नहीं है। आडंबर को छोड़ना ही सबसे बड़ी अमीरी है। सादगी में ही शांति है। प्रेम में ही आनंद है। बाँटने में ही खुशी है।
अगली बार जब त्यौहार आए, तो एक संकल्प लीजिए। इस बार दिखावे के लिए नहीं, दिल से त्यौहार मनाऊँगा। इस बार कर्ज लेकर नहीं, बजट में त्यौहार मनाऊँगा। इस बार फोटो के लिए नहीं, परिवार के लिए त्यौहार मनाऊँगा। इस बार पटाखों के शोर से नहीं, दीयों की शांति से त्यौहार मनाऊँगा। इस बार अकेले नहीं, सबके साथ त्यौहार मनाऊँगा।यही सच्चा त्यौहार होगा। यही हमारी परंपरा की रक्षा होगी। यही हमारे बच्चों के लिए सबसे बड़ा उपहार होगा।
त्यौहार का अर्थ ही यही है कि कोई भूखा न रहे, कोई अकेला न रहे, कोई दुखी न रहे। सब मिलकर मनाएँ, यही त्यौहार है।
आडंबर छोड़ो, प्रेम जोड़ो।
दिखावा छोड़ो, सादगी अपनाओ।
यही दीपावली ही नहीं सभी त्यौहारो का सच्चा संदेश है।


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