पूर्व शिक्षक विधायक स्व.रामनाथ मोते के पुतला का अनावरण

भिवंडी।। शिक्षकों के लिए स्थापित विद्यासेवक सहकारी पतपेढी के कल्याण स्थित मुख्य कार्यालय में पूर्व शिक्षक विधायक स्व.रामनाथ मोते की यादगार में उनका पुतला लगाया है.उनकी प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर 23 अगस्त को शिक्षा प्रेमी विजय जाधव द्वारा मोते सर के पुतले का अनावरण किया गया.इस दौरान विजय जाधव के साथ पतपेढी के सलाहकार जयंतराव ओक एवं पतपेढी के अध्यक्ष सुधीर घागस प्रमुख रूप से मौजूद थे. सुधीर घागस ने बताया कि इसी तरह से पांच सितंबर को रत्नागिरी के दत्तवाड़ी में मोते सर के स्मारक का अनावरण विधायक निरंजन डावखरे द्वारा किया जाएगा.घागस ने कहा कि सर के यह दोनों स्मारक कार्यकर्ताओं को हमेशा कार्य की प्रेरणा देते रहेंगे.कार्यकर्ता दूसरे पीड़ितों के लिए कार्य करते रहना संघर्ष करते रहना यही वास्तव में मोते सर को श्रद्धांजलि अर्पित होगी।
   
महाराष्ट्र राज्य शिक्षण क्रांति के राज्य अध्यक्ष सुधीर घागस कुछ लोग विरासत से राजनीति में आते हैं तो कुछ राजनीति में करियर बनाने के लिए आते हैं। परंतु सेवा करते-करते अपने आप जनमत से राजनीति में आने वाले दुर्लभ ही होते हैं। यह तीसरा प्रकार जनता के लिए मानो ईश्वर अवतार और इसमें सबसे आगे कोई नाम है तो वह है कोकण विभाग के पूर्व शिक्षक विधायक रामनाथ मोते सर । शिक्षकों को देवता मानकर दिन रात उनके न्याय अधिकारों के लिए बिना डरे लड़ने वाले मोते सर शिक्षकों के देवता कब हुए यह समझ में ही नहीं आया। शिक्षक होते ही शिक्षकों के न्याय के लिए संघर्ष करते रहना यह व्रत मोते सर ने स्वीकार किया। इस जगह शिक्षक इस परिभाषा में मुख्याध्यापक एवं शिक्षकेतर ऐसे सभी स्कूली कर्मचारियों का समावेश है।
   
सन 1975-76 से मोते सर ने अध्यापन कार्य के साथ-साथ संगठन के काम की भी शुरुआत की। पूर्व शिक्षक विधायक गुरुवर्य स्व. वसंत बापट सर की उंगली थाम कर मोते सर ने अपने शैक्षणिक एवं संगठनात्मक कार्य की शुरुआत की। शिक्षकों को सेवा सुरक्षा देने वाला अधिनियम 1977 एवं नियमावली 1981 लागू करने के लिए राज्य भर जो विविध स्वरूप के आंदोलन हुए.उसमें नए सिरे से काम की शुरुआत करने वाले मोते सर का सक्रिय योगदान रहा है। इसलिए उपर्युक्त कानून नियमावली इसी के साथ-साथ स्कूल संहिता सभी मोते सर को मुखोदगत थे। नियमावली 1981 के और शब्द शब्द सर ने याद किया था. घागस ने बताया कि उनके जैसे नए कार्यकर्ताओं को वह हमेशा बताते थे शाम को चाय के लिए इकट्ठा होने के बाद कोई भी एक नियम बोलकर दिखाएं और उस पर वे चर्चा करते थे। सभी नियम खत्म होने तक यहां जारी रहता था। कार्यकर्ताओं को यह सभी बातों का बारीकी से अभ्यास होना जरूरी है ऐसा उनका आग्रह रहता था। इसलिए उन्होंने शिक्षक परिषद के माध्यम से कई बार कार्यशालाओं का एवं अभ्यास वर्गों का सफलतापूर्वक आयोजन किया था।
आर. के.अभंग विद्यालय, उल्हासनगर- 4 में शिक्षक के तौर पर 28 वर्ष परफेक्ट शालेय कार्य 8000 सभासद वाले विद्या सेवक पतपेढी में  9 वर्ष कार्यकारी के रूप में सभासद के हित में उल्लेखनीय काम, महाराष्ट्र राज्य शिक्षक परिषद के कोकण विभाग के कार्यवाहक के तौर पर हजारों शिक्षकों के फंसे हुए काम विविध मार्गो से हल करके संगठन बढ़ाने के लिए अनमोल योगदान, विधान भवन में 12 वर्ष उल्लेखनीय कार्य के लिए सम्मानित ,विधान भवन में 100% उपस्थिति, विधान भवन सभागृह में शिक्षकों के प्रश्न उपस्थित करने के लिए महाराष्ट्र राज्य के सुवर्ण महोत्सव के उपलक्ष में 2006-7 इस वर्ष "उत्कृष्ट भाषण" पुरस्कार से महामहिम राष्ट्रपति के हाथों सन्मान, विधान भवन के अमृत महोत्सव के उपलक्ष में उल्लेखनीय योगदान के लिए गौरव, ऐसे कई सारे पहलू मोते सर इस हीरे को थे।
   
घर दरवाजों पर तुलसी पत्र रखकर समर्पित भावना से काम करने वाला यह कार्यकर्ता चार दशक से भी अधिक काल शिक्षकों के लिए दिन रात मेहनत की। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती इंदुमती उनकी एक बेटी दीपाली एवं दीपाली ताई की एक बेटी है कुमारी मानसी इनके लिए मोते सर ने किया हुवा काम अगर देखें तो लाल बहादुर शास्त्री आंखों के सामने आ जाते हैं। न घर न संपत्ति कुछ भी पीछे न रखकर सर हमेशा शिक्षकों के लिए मेहनत करते रहे|  परिवार की ओर ध्यान न देकर जिनके लिए सर मेहनत ले रहे थे। जिनका संसार उन्होंने खड़ा किया जिनको अत्यंत कठिन मार्ग से निकालकर उदरनिर्वाह को लगाया कुछ लोगों को अलग अलग पदों पर बिठाया.उन्हीं में से कुछ लोगों ने सर के कठिन समय में साथ छोड़ दिया जिस विश्वास से उन्होंने इन मनुष्य को जोड़ा था उस पर इस भरोसे के टुकड़े हो गए उनकी जरूरत रहते समय उन्होंने सर को पीठ दिखाइ।यह दुःख उनको अंत तक सताती रही।
   
शिक्षकों के आग्रह  के कारण उन्होंने विधान भवन तीसरी बार लड़ी परंतु राजनीति एवं चुनाव की पद्धत इसमें बहुत ज्यादा बदलाव होने से हार का सामना करना पड़ा। कोमल मन के मोते सर को वह हार का स्वीकार करने नहीं आया यह सत्य। आज महाराष्ट्र के 7 शिक्षक मतदार संघ में से केवल नागपुर विभाग के शिक्षक आमदार यह एकमेव पेशे से शिक्षक हैं। आज शिक्षा विभाग में चल रहा भ्रष्ट कारोबार हम देख ही रहे हैं। इस पर अंकुश होना चाहिए बढ़ते भ्रष्टाचार को रोकना विविध स्तर पर जानबूझकर प्रलंबित रखे जाने वाले शिक्षकों के काम पूरे करके मोते सर ने क्रांतीज्योती सावित्रीबाई फुले इनके जयंती के दिन याने दिनांक 3 जनवरी 2020 को "महाराष्ट्र राज्य शिक्षण क्रांती संघटना" स्थापित की। किसी भी राजनीतिक पक्ष का अथवा संघटना का साथ ना होने से विधान भवन के चुनाव में मोते सर को 6000 से अधिक मत प्राप्त हुए। यह उनका निस्वार्थ कार्य का उनके चाहने वालों ने किया हुआ सन्मान था। इसी विश्वास के साथ उन्होंने शिक्षण क्रांति संघटना का बीज बोया अत्यंत कम समय में शिक्षण क्रांती संघटना ने यश प्राप्त किया कोकन विभाग का ही नहीं तो राज्य के हजारों शिक्षकों को मोतीसर के कार्य पर एवं विचारधारा पर श्रद्धा है शिक्षण क्रांती संघटना निश्चित रूप से आगे बढ़ेगी एवं शिक्षा क्षेत्र में क्रांति होगी ऐसा प्रचंड विश्वास शिक्षा क्षेत्र में काम करने वालों हजारों शिक्षा प्रेमी एवं शिक्षकों को है समाज के अनेक ईमानदार नेता संघटना के पीछे खड़े हैं और मोते सर के शिक्षण क्रांति का सपना पूर्ण करने के लिए प्रयत्नशील है।
   
अंतिम सांस तक काम करना जाने क्या होता है यह मोटे सर का जीवन देखने के बाद ध्यान में आता है पराजय झोली में आने के बाद सर मानसिक रूप से डगमगाए परंतु उन्होंने काम मात्र एक भी दिन नहीं रोका। अंतिम दिनों में अस्पताल में दाखिल होने से 1 दिन पहले मोते सर को जिला परिषद थाने यहां के गैर व्यवहार के संदर्भ में पत्र लिखा हुआ था। उसकी दखल लेकर आज ही विभागीय स्तर की पूछताछ शुरू है जिनकी सभा है मैं अटेंड कर रहा हूं परंतु मोते सर के बाद इस प्रकरण को शिथिलता आई है।
   
किसी की भी उम्मीद ना रखते हुए मौतें सर सतत शिक्षकों के लिए अधिकारियों से झगड़ते रहे शिक्षकों के लिए हमें परेशान करने वाला लोक प्रतिनिधि के रूप में अनेक अधिकारियों ने सर को बहुत ज्यादा तकलीफ दी तो कुछ इमानदार अधिकारी सर के साथ खड़े रहे परंतु इस बदलते दौर में सर ने खुद को नहीं बदला। चार दशकों से पहले का उनका काम करके लेने का तरीका वही था। और वही शिक्षकों को अच्छा लगने वाला था 11 दिन तक अस्पताल में सर मृत्यू से लड़ रहे थे। परिवार वाले उनका पूरा ध्यान रख रहे थे। परंतु अंत में यह युद्ध खत्म हो गया...... हजारों परिवारों को खड़ा करने वाला शिक्षकों का भगवान दिनांक 23 अगस्त 2020 को भगवान के घर चले गए। खबर सुनते ही हजारों मोते प्रेमियों को पलभर कुछ भी सूझ नहीं रहा था। अश्रुओ का बांध फूट गया था। एक दूसरे को बाहों में लेकर कोई किसी का सांत्वना  कर रहा था तो कोई रो रहा था।

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