भिवंडी की हवा में जहर: डाइंग-साइजिंग कंपनियों से निकल रहा काला धुआं बना मौत का धुआं

भिवंडी। भिवंडी के औद्योगिक क्षेत्रों में चल रही डाइंग और साइजिंग कंपनियां अब स्थानीय लोगों के लिए खतरा बन चुकी है। इन कंपनियों से निकलने वाला काला धुआं न केवल वातावरण को जहरीला बना रहा है, बल्कि शहर के नागरिकों के फेफड़ों में भी जहर घोल रहा है। सूत्रों के अनुसार, इन कंपनियों में बड़े-बड़े बॉयलरों को चलाने के लिए कोयले की जगह लकड़ी,रबर,पुट्ठा,प्लास्टिक, थर्माकोल और यहां तक कि इमारत निर्माण में इस्तेमाल होने वाली प्लाई-बोर्ड तक जलाई जा रही है। इससे निकलने वाला धुआं इतना घना होता है कि आसपास के इलाकों में दिन के उजाले में भी धुंध छाई रहती है। इमारतों के छतों पर राख की ढेर लग जाती है। स्थानीय डॉक्टरों के मुताबिक, इस जहरीली हवा के कारण इलाके में श्वसन संबंधी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े है। बच्चों और बुजुर्गों में खांसी, सांस फूलना, गले में खराश और आंखों में जलन जैसी समस्याएं आम होती जा रही है। भिवंडी महानगरपालिका के पर्यावरण विभाग के पास इन फैक्ट्रियों पर सीधे कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। वह केवल शिकायतों को महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल (एमपीसीबी) के कल्याण कार्यालय को भेजता है। हालांकि, सूत्रों के अनुसार, एमपीसीबी का भिवंडी-वाडा क्षेत्राधिकारी रोजाना भिवंडी का औपचारिक निरीक्षण करते है, लेकिन इसके बावजूद अब तक किसी प्रदूषणकारी फैक्ट्री पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। नागरिकों का कहना है कि वे इस जहरीले धुएं से परेशान हो चुके हैं। कई बार विरोध और शिकायतों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है। स्थानीय सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे बड़े आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक और रबर जलाने से निकलने वाली गैसें डाइऑक्सिन और फ्यूरन जैसे जहरीले रसायन उत्पन्न करती हैं, जो कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकते है। अगर हालात पर जल्द नियंत्रण नहीं किया गया, तो भिवंडी की हवा में सांस लेना आने वाले दिनों में और भी मुश्किल हो जाएगा।

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