रामपुर (कैमूर): मकर संक्रांति का पर्व नजदीक आते ही रामपुर प्रखंड के बेलांव सहित विभिन्न बाजारों में चूड़ा, गुड़ और तिलवा की दुकानें सज गई हैं। बाजार में रौनक तो है, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भारतीय ग्रामीण संस्कृति और गंवई परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं। कभी त्योहार की दस्तक देने वाली ओखल-मूसल और ढेकी की 'धमक' अब गांवों से पूरी तरह गायब हो चुकी है। एक समय था जब मकर संक्रांति से हफ्तों पहले गांवों में चूड़ा कूटने की गूंज सुनाई देती थी। ओखल-मूसल से तैयार चूड़े की जो सोंधी खुशबू और मिठास होती थी, वह अब बीते जमाने की बात हो गई है। आज के मशीनी युग में लोग पूरी तरह 'रेडिमेड' सामानों पर निर्भर हो गए हैं। बड़े-बड़े मिलों से निकला पॉलिश किया हुआ चूड़ा अब थालियों की शोभा बढ़ा रहा है, जिसमें न तो वह पुरानी शुद्धता है और न ही वह गुण।हैरानी की बात यह है कि दो बीघे से लेकर सौ बीघे तक की खेती करने वाले किसान भी अब अपने घर पर चूड़ा तैयार नहीं कर रहे। खुद अन्नदाता कहलाने वाले किसान भी बाजार से चूड़ा और लाई खरीदकर त्योहार मना रहे हैं। घर की बनी चीजों का 'चटकन' अब सुनाई नहीं देता। यहाँ तक कि शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्यों में भी ओखल-मूसल की रस्म निभाने के लिए लोग दूसरों से उधार मांगकर औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। रामपुर प्रखंड के बेलांव बाजार में दुकानें तो सज चुकी हैं और खरीदारों की भीड़ भी उमड़ रही है। लेकिन बाजार में मिल रहे चूड़े की गुणवत्ता पर सवालिया निशान हैं। दुकानदार पुराने धान का चूड़ा तैयार कर बेच रहे हैं, जिसकी सही पहचान करना आम आदमी के लिए मुश्किल है। सोंधी दही और ताजे चूड़े का वह पारंपरिक मेल अब केवल यादों में सिमट कर रह गया है।
कुल मिलाकर, परंपराओं की जगह अब बाजारवाद ने ले ली है, जिससे मकर संक्रांति का त्योहार अपनी मौलिकता खोता जा रहा है।
रिपोर्टर