उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस बना सियासी अखाड़ा

 भिवंडी में उत्तर भारतीय समाज दो भागों में बंटा

एक ही दिन- एक ही समय समाज का अलग अलग कार्यक्रम


भिवंडी। उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस, जो कभी उत्तर भारतीय समाज की एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता था, अब भिवंडी में खुलेआम सियासी टकराव और वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बन चुका है। स्थापना दिवस के दूसरे ही दिन शहर में एक ही समय पर दो अलग-अलग स्थानों पर कार्यक्रम रखे गए हैं, जिससे उत्तर भारतीय समाज का गहरा बंटवारा सामने आ गया है।

हैरानी की बात यह है कि दोनों गुटों के आयोजनों में मुख्य अतिथि के रूप में मराठी नेताओं को बुलाया गया है। इससे यह सवाल उठने लगा है कि यह आयोजन उत्तर प्रदेश की अस्मिता का उत्सव है या स्थानीय राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने का जरिया। सूत्रों के अनुसार, कार्यक्रमों से पहले ही चंदा वसूली का खेल पूरी रफ्तार पकड़ चुका है। दुकानदारों, व्यापारियों और समाज के लोगों पर खुले और परोक्ष दबाव बनाए जाने की चर्चा है। कई लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि स्थापना दिवस अब “सम्मान का पर्व” नहीं, बल्कि “पावती और पोस्टर का उत्सव” बनता जा रहा है।

उत्तर भारतीय समाज सेवा संस्था की आंतरिक बनावट भी सवालों के घेरे में है। जानकारी के मुताबिक संस्था में 7 ठाकुर, 5 ब्राह्मण, एक आहिर और एक बनिया शामिल हैं। इस आंकड़े ने समाज के भीतर यह बहस छेड़ दी है कि क्या यह संस्था पूरे उत्तर भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करती है या कुछ चुनिंदा जातियों का क्लब बनकर रह गई है।

इस पूरे विवाद पर भाजपा उत्तर भारतीय प्रकोष्ठ के भिवंडी शहर अध्यक्ष मंगेश यादव ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हम चंदा-पावती वाले नेता नहीं हैं। समाज को लूटकर राजनीति करने वालों से हमारा कोई लेना-देना नहीं।” उनके इस बयान ने भिवंडी की सियासत में हलचल और तेज कर दी है।

गौरतलब है कि भिवंडी में उत्तर प्रदेश स्थापना दिवस को बड़े स्तर पर मनाने की परंपरा एमपी चुनाव के दौर में शुरू हुई थी। तब इसे समाज को संगठित करने की पहल बताया गया था, लेकिन अब वही आयोजन गुटबाजी, होड़ और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन चुका है। हर कोई खुद को समाज का ठेकेदार साबित करने की दौड़ में शामिल नजर आ रहा है।

वरिष्ठ समाजसेवियों का कहना है कि यदि समय रहते इस खतरनाक बंटवारे पर लगाम नहीं लगी, तो उत्तर भारतीय समाज की सामाजिक एकता को गहरा नुकसान हो सकता है। स्थापना दिवस, जो जोड़ने के लिए था, वही अब तोड़ने का हथियार बनता दिख रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तर भारतीय समाज इस सियासी खेल को समझ पाएगा या फिर हर साल स्थापना दिवस इसी तरह गुटों की ताकत आजमाने का मंच बनकर रह जाएगा।

रिपोर्टर

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