यूजीसी के विरुद्ध होने वाली मार्च स्थगित, सर्वोच्च न्यायालय का आभार
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Jan 30, 2026
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किसी भी तरह की जातिगत कानूनों का हम विरोध करते हैं - कुमार चन्द्र भुषण
संवाददाता श्याम सुंदर पाण्डेय की रिपोर्ट
कैमूर-- यूजीसी एक्ट के तहत सवर्णों के ऊपर केंद्रीय कमेटी के द्वारा बनाए गए भेद भाव युक्त कानूनों के विरुद्ध होने वाली मार्च को सामाजिक संगठनों द्वारा स्थगित करतें हुए, राष्ट्र के सर्वोच्च न्यायालय का आभार व्यक्त किया गया। संबंध में जानकारी देते हुए राष्ट्रीय सवर्ण समाज संघ प्रदेश अध्यक्ष सह कलमकार कुमार चन्द्र भुषण तिवारी
एवं प्रगतिशील मानवाधिकार मानव सेवा संघ के जिला अध्यक्ष अजय कुमार पाण्डेय
के द्वारा जानकारी दिया गया कि यूजीसी एक्ट के विरुद्ध सामाजिक संगठन राष्ट्रीय सवर्ण समाज संघ,करणी सेना, परशुराम सेना, प्रगतिशील मानवाधिकार मानव सेवा संघ के साथ ही अन्य संगठनों द्वारा यूजीसी एक्ट के नए कानूनों के विरुद्ध संयुक्त रूप से 30 जनवरी दिन शुक्रवार को कैमूर जिला मुख्यालय भभुआं एकता चौक से कैमूर समाहरणालय तक पैदल मार्च के साथ ही राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन कैमूर जिला पदाधिकारी को सौंपने निर्णय लिया गया था। पर 29 जनवरी को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने यूजीसी एक्ट के नए कानूनों पर रोक लगाते हुए सरकार विपक्ष सहित जातिवादी मानसिकता के पुजारियों के मुंह पर करारा तमाचा जड़ते हुए रोक लगा दिया गया। जिसके बाद राष्ट्रीय सवर्ण समाज संघ एवं प्रगतिशील मानवाधिकार मानव सेवा संघ के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय का आभार व्यक्त करते हुए प्रदर्शन मार्च को फिलहाल के लिए स्थगित किया गया। कुमार चन्द्र भुषण तिवारी के द्वारा राष्ट्र में किसी भी तरह की जातिगत कानूनों का विरोध किया गया। उन्होंने कहा राष्ट्र में 370, 35 ए, तीन तलाक वक्फ बोर्ड संशोधन, राम मंदिर जैसे मुद्दों पर जहां भारत अपना दम खम दिखा करके काले कानूनों को समाप्त कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर हिंदुओं की बांटने की जो साजिश रची गई वह शर्मनाक और निंदनीय है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश में इस कानून पर रोक लगाकर देश जलने तथा एक विभाजन से बचाया और आशा करते है कि ऐसे काले कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समाप्त किया जायेगा। विभाजन की न्यू रखने वालों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय से मांग करता हुं, कि कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि आने वाले भविष्य में कोई भी भेदभाव युक्त कानून न बना सकें, जिससे देश में नफरत और विभाजन का खतरा पैदा हो। यदि नफरत की बीज बोने वाले न्यायालय के लगाए गए झटके से भी नहीं मानते हैं तो इसका परिणाम गंभीर होगा।


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