अध्यात्म युक्त शिक्षा के बिना मानव के अंदर संस्कार का उदय होना संभव नहीं
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Feb 24, 2026
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दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय कि रिपोर्ट
दुर्गावती (कैमूर)- आज के परिवेश में मनुष्य के संस्कार विहीन होने से समाज कुपथ पर चलता नजर आ रहा है इसलिए अध्यात्म के तहत गुरुकुल परंपरा की तरह बच्चों को शिक्षा देना अत्यंत आवश्यक है ताकि संस्कार विहीन समाज के निर्माण पर रोक लग सके। आज के राजनेताओं का मानना है कि संविधान से देश चलेगा लेकिन जिस संवैधानिक ढांचे में संस्कार ही नहीं रहेंगे वह संविधान देश में एकता नहीं ला ही नहीं सकता न अच्छे समाज का निर्माण कर सकता है, न ही ईमानदारी पूर्वक जनता की सेवा करने में बल मिल सकता है। आजादी से पहले भारत में गुरुकुल की परंपरा से शिक्षा दीक्षा देने का काम होता था।छात्र गुरुकुल में रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर गुरुकुल की सेवा कर जब घर आते थे तो बूढ़े माता-पिता के साथ-साथ शुद्ध मन से और ईमानदारी से देश और समाज की सेवा में तथा अपने गृह कार्य में जुट जाते थे। जिसका परिणाम होता था कि शासन करता न बेईमान होता था न पक्षपात पूर्ण न्याय करता था न हीं वृद्ध मां-बाप धर से निकाले जाते थे। समाज में महिलाओं के प्रति मातृत्व का भाव रहता था बच्चियों और युवतियों के ऊपर न अत्याचार न कुदृष्टि होती थी बल्कि उन सबको देवी के रूप में समाज के द्वारा पूजा जाता था। आज अध्यात्म विहिन शिक्षा का ही परिणाम है कि आए दिन नए-नए समाचार पत्रों में खबरें छपती रहती है जिसका पूर्ण रूप से व्याख्या करना उचित नहीं है। राज नेताओं का मानना है कि धर्म माने कथा पुराण का स्वाध्याय पाठ करना गेरुआ पहनना तिलक लगाना होता है तभी तो राजनेता लोग कहते हैं की राजनीति में धर्म की क्या जरूरत है धर्म राजनीति से अलग का विषय। जिसका परिणाम है कि जातिवादी कानून धार्मिक उन्माद घोटाले पर घोटाले देखने को मिल रहे हैं। व्यवसाय की दृष्टिकोण से इंटरनेट पर अश्लील वीडियो उपलब्ध है जिसे कोई भी किसी समय देख सकता है जिसे सरकार आय का स्रोत मानती है। क्या देश को ऐसे आय के स्रोत का माध्यम बनाने से समाज सुरक्षित रहेगा,संस्कार युक्त रहेगा या संस्कार विहीन बनेगा यह एक अहम सवाल है। क्या संस्कार विहिन समाज या संस्कार विहीन राजनेता से देश सुरक्षित रहेगा या न्याय की कल्पना की जा सकती है कभी नहीं। इसलिए सरकार को चाहिए कि सनातन धर्म के अनुसार पूर्व में चल रहे गुरुकुल परंपरा को फिर से भारत के विद्यालयों लागू किया जाना चाहिए ताकि ऐसे विद्यालय संस्कार युक्त समाज का निर्माण करें और देश को संस्कार विहीन होने से जो अपराध हो रहा है उसे रोका जा सके।


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