भिवंडी मनपा में अव्यवस्था का आलम, मनपा मुख्यालय में भटक रहे है नगरसेवक

गटनेताओं को भी नहीं मिला कार्यालय

स्थायी समिति गठन सियासी खींचतान में अटका


भिवंडी। भिवंडी महानगर पालिका में साढ़े तीन साल बाद जनप्रतिनिधियों को सत्ता मिलने के बावजूद व्यवस्था पटरी पर नहीं आ सकी है। हालात यह हैं कि सत्ता संभाले तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक विभिन्न दलों के गटनेताओं को बैठने के लिए कार्यालय तक उपलब्ध नहीं कराया गया है। इससे नाराज नगरसेवकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

बतादें कि 15 जनवरी को हुए मनपा चुनाव और 20 फरवरी को महापौर व उपमहापौर के चुनाव के बाद उम्मीद थी कि प्रशासनिक कामकाज तेज होगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है। कांग्रेस, भाजपा, सपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद), शिवसेना और अन्य गुटों के गटनेताओं की नियुक्ति और पंजीकरण तो हो चुका है, फिर भी उनके कार्यालय अब तक शुरू नहीं किए गए हैं। नगरसेवकों का कहना है कि मनपा में काम के सिलसिले में आने पर उन्हें बैठने तक की जगह नहीं मिलती, जिससे जनता के काम भी प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी मंजिल पर महापौर और उपमहापौर के कार्यालय तो शुरू कर दिए गए, लेकिन उसी मंजिल पर गटनेताओं के दफ्तर अब भी बंद पड़े हैं।

मनपा के कार्यकारी शहर अभियंता सचिन नाईक के मुताबिक, गटनेताओं के कार्यालयों का नवीनीकरण कार्य जारी है और काम पूरा होते ही उन्हें कार्यालय सौंप दिए जाएंगे। हालांकि, नगरसेवक इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट नजर नहीं आ रहे। वहीं दूसरी ओर, महापौर-उपमहापौर के चुनाव को दो महीने बीत जाने के बावजूद स्थायी समिति के 16 सदस्यों और सभापति का चुनाव अब तक नहीं हो सका है। इसके पीछे सियासी खींचतान को मुख्य वजह माना जा रहा है।

मनपा गलियारों में चर्चा है कि स्थायी समिति के सभापति पद को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद) के भीतर ही टकराव चल रहा है। इस पद के लिए जहां पूर्व उपमहापौर इमरान खान की बेटी ईशा खान का नाम आगे बताया जा रहा था, वहीं वरिष्ठ नगरसेवक फराज (बाबा) बहाउद्दीन ने भी मजबूत दावेदारी पेश कर दी है। इसी खींचतान के चलते मामला अटका हुआ है।इस बीच, मनपा के जनसंपर्क अधिकारी श्रीकांत परदेशी ने जानकारी दी है कि 15 अप्रैल को प्रस्तावित महासभा में स्थायी समिति के सदस्यों का चयन किया जाएगा, जिसके बाद सभापति के चुनाव की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। अब देखना होगा कि 15 अप्रैल की महासभा के बाद क्या मनपा की यह अटकी हुई व्यवस्थाएं पटरी पर आती हैं या सियासी खींचतान यूं ही विकास कार्यों में बाधा बनी रहती है।

रिपोर्टर

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