सरकारी अस्पतालों में आयुष चिकित्सा व्यवस्था की उपेक्षा चिंताजनक
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Apr 30, 2026
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संवाददाता पारसनाथ दुबे।
डेहरी। रोहतास।बिहार सरकार द्वारा वर्ष 2010 से राज्य के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में आयुष चिकित्सकों की बहाली की गई, जिनमें होम्योपैथिक, आयुर्वेदिक एवं यूनानी पद्धति से स्नातक डिग्रीधारी चिकित्सकों की नियुक्ति हुई। यह निर्णय राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को बहुआयामी बनाने तथा आमजन को सस्ती, सुलभ और वैकल्पिक चिकित्सा उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था।
किन्तु अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि शुरुआती एक छोटी अवधि को छोड़ दें तो अब वर्षों से अधिकांश सरकारी अस्पतालों में न तो होम्योपैथिक दवाएं उपलब्ध हैं, न आयुर्वेदिक औषधियां और न ही यूनानी दवाओं की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। परिणामस्वरूप आयुष चिकित्सक अस्पतालों में मौजूद तो हैं, परंतु उनके ज्ञान, प्रशिक्षण और विशेषज्ञता का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। यह स्थिति न केवल सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का उदाहरण है, बल्कि आम मरीजों के साथ भी अन्याय है।
ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हजारों मरीज ऐसे हैं, जो कम दुष्प्रभाव वाली, सस्ती और दीर्घकालिक लाभ देने वाली आयुष चिकित्सा पर भरोसा करते हैं। यदि अस्पतालों में दवाएं ही उपलब्ध नहीं होंगी, तो जनता इस व्यवस्था से कैसे लाभान्वित होगी?
यह सवाल भी उठना स्वाभाविक है कि आखिर किन कारणों से वर्षों से आयुष दवाओं की नियमित आपूर्ति बाधित है। क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही है, या फिर कहीं न कहीं तथाकथित एलोपैथिक दवा बाजार की मजबूत लॉबी के दबाव में आयुष चिकित्सा को कमजोर बनाए रखने की प्रवृत्ति काम कर रही है? सरकार को इस संदेह को दूर करने के लिए पारदर्शी जांच करानी चाहिए।
मैं बिहार सरकार, स्वास्थ्य विभाग एवं आयुष विभाग से मांग करता हूं कि:
राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में आयुष दवाओं की नियमित आपूर्ति तत्काल सुनिश्चित की जाए।
अस्पतालवार आयुष दवा उपलब्धता की सार्वजनिक मॉनिटरिंग व्यवस्था बनाई जाए।
आयुष चिकित्सकों की भूमिका और जिम्मेदारी को स्पष्ट करते हुए उन्हें प्रभावी कार्य वातावरण दिया जाए।
आयुष चिकित्सा के प्रति जनता में जागरूकता अभियान चलाया जाए।
यदि सरकार ने इस दिशा में शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह स्पष्ट होगा कि आयुष चिकित्सकों की नियुक्ति केवल दिखावा बनकर रह गई है। बिहार जैसे बड़े राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं के विविध विकल्पों को कमजोर करना जनहित के खिलाफ है।
इस संबंध में मानवाधिकार कार्यकर्ता संतोष उपाध्याय ने बिहार सरकार को एक पत्र लिखकर आयुर्वेदिक अस्पताल में दवा नहीं होने के कारण यह बहुत बड़ी चिंता के विषय है।


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