शिशु वाटिका को संस्कारों का सशक्त केंद्र बनाने का आह्वान – निखिलेश महेश्वरी
- राजेंद्र यादव, ब्यूरो चीफ, मध्यप्रदेश
- May 18, 2026
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मध्य प्रदेश
प्रांतीय फाउंडेशनल स्टेज आचार्य सामान्य एवं दक्षता वर्ग के अष्टम दिवस पर हुआ प्रेरक संवाद सत्र
विद्या भारती मध्यभारत प्रांत की योजना से नगर के सरस्वती शिशु/विद्या मंदिर लिंक रोड सिरोंज में आयोजित प्रांतीय फाउंडेशनल स्टेज आचार्य सामान्य एवं दक्षता वर्ग के अष्टम दिवस पर संवाद सत्र का शुभारंभ माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन एवं वंदना के साथ किया गया।
इस अवसर पर सम्माननीय श्री निखिलेश महेश्वरी (प्रांत संगठन मंत्री, विद्या भारती मध्यभारत प्रांत), विशेष अतिथि श्री उमेश सोनी (BEO), श्री महेश ताम्रकार (प्राचार्य, सांदीपनी विद्यालय), श्रीमती सुरेखा ठाकुर (प्रांत संयोजिका), श्री मुकुटबिहारी शर्मा एवं श्री रामदयाल लहरपुरे (वर्ग पालक अधिकारी) विशेष रूप से उपस्थित रहे।
संवाद सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित श्री निखिलेश महेश्वरी ने ‘शिशु वाटिका का प्रभावी संचालन’ विषय पर शिक्षार्थी दीदियों को मार्गदर्शन प्रदान करते हुए कहा कि शिशु वाटिका केवल शिक्षा देने का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रथम पाठशाला है। बालक के जीवन के प्रारंभिक वर्षों में उसके शरीर, मन, बुद्धि एवं भावनात्मक विकास की मजबूत नींव इसी अवस्था में रखी जाती है। इसलिए शिशु वाटिका को केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित न रखकर संस्कारयुक्त एवं बालक-केंद्रित शिक्षा का सशक्त केंद्र बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा दर्शन प्रत्येक बालक की “चिति” अर्थात उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति को पहचानने और उसके अनुरूप शिक्षा प्रदान करने की बात करता है। प्रत्येक बालक की रुचि, क्षमता एवं सीखने की शैली भिन्न होती है। कोई बालक संगीत में रुचि रखता है तो कोई चित्रकला, खेल अथवा अन्य गतिविधियों में — इसलिए शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो बालक के स्वाभाविक विकास को प्रोत्साहित करे।
श्री महेश्वरी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए बताया कि फाउंडेशनल स्टेज के अंतर्गत 3 से 8 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है। यह आयु बालक के सर्वांगीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है, क्योंकि इसी समय बच्चों की ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ अत्यधिक सक्रिय रहती हैं। यदि इस अवस्था में उचित वातावरण, संस्कार एवं सृजनात्मक शिक्षण पद्धति प्रदान की जाए, तो बालक का व्यक्तित्व सुदृढ़ एवं राष्ट्रहितकारी बन सकता है।
उन्होंने शिक्षार्थी दीदियों से आग्रह किया कि वे मातृभाव के साथ बालकों के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य करें तथा खेल-खेल में शिक्षा, संस्कार, अनुशासन एवं आत्मीयता के माध्यम से बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ।
कार्यक्रम के दौरान प्रशिक्षार्थी एवं संचालन टोली की दीदियॉ उपस्थित रहीं।


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