रोजगार और नौकरी की तलाश में बितते उम्र का ठिकाना कहां

दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडे की रिपोर्ट 

दुर्गावती/कैमूर:-- ऐ पेट तुझे भरने के लिए तो कुछ करना ही पड़ेगा चाहे अपराध हो या छोटी-मोटी दुकान या टेंपो रिक्शा का रोजगार चारों तरफ मचा है युआओं में हाहाकार तेरी कौन सुनेगा पुकार। प्रकृति निर्वाध रूप से अपने समय पर काम कर रही है लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनाव अपने समय पर हो रहे हैं लेकिन युवाओं के बीतते बीच के उम्र का ठिकाना कहां विश्राम लेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। कुछ उम्र तो शिक्षा में बिता दी और कुछ उम्र तो नौकरी और रोजगार की तलाश में आखिरकार पड़ाव कहा होगा यह नजर नहीं आ रहा है। केंद्र में भारत की सरकार हो चाहे राज्यों में संबंधित पार्टियों की सरकार जहां देखो  बेरोजगार जुआ इधर-उधर भटकते नौकरी की तलाश करते नजर आ रहे हैं। जातिवाद की कुंठा से ग्रसित तथा जातिवाद के आरक्षण से ग्रसित राजनेता केवल अपने कुर्सी से चिपके हुए अगले चुनाव का इंतजार कर रहे हैं। लोकतंत्र में 5 साल की अवधि केवल अपने कुर्सी बरकरार रखने के लिए तौर तरीके की तलाश करते राज नेता अपना 5 साल का समय पूरा कर रहे हैं। राजनेताओं के ऐसी गैर जिम्मेदाराना राजनीतिक विचारधारा से युवा त्रस्त है। युवाओं को नौकरी और रोजगार देने की जगह सरकार के द्वारा युवाओं को नौकरी से वंचित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे और परीक्षाएं में बाधा के रूप के सामने लाई जा रही हैं ताकि युवाओं को न नौकरी मिल सके न रोजगार। जहां देखो सरकारी दफ्तर में सरकारी विभागों में खाली स्थान पड़े हुए हैं लेकिन ए पेंशनधारी राजनेता केवल सुख सुविधा भोगी उसको भरने की जगह अपनी जेब भरने पर लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत नौकरी में खाली पड़े सीटों को कौन भरेगा आखिरकार यह जिम्मेदारी किसकी है। जब समय पर चुनाव निश्चित है तो उसी तरह समय पर खाली सीटों को क्यों नहीं भरा जा रहा है। आने वाला भारत का इतिहास इस गंदी राजनीति को बाटो शासन करो की रीति को बेरोजगारों के साथ किए जा रहे भेदभाव को कभी माफ नहीं करेगा चाहे सरकार किसी की हो। आज भारत के युवाके दिल पर क्या बीत रही है और उनकी बढ़ती उम्र को टुकड़े-टुकड़े करने वाले राजनेता मुस्कुराते चल रहे हैं लानत है ऐसी आजादी जो युवाओं को भूखे मरने के लिए उनको भाग्य भरोसे छोड़ दिया है।

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