साईकिल से ईंधन बचत के साथ स्वस्थ बनता है


रोहतास। प्रधानमंत्री के डीजल पेट्रोल डीजल ईंधन बचाने के अपील के बाद विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर काशी काव्य संगम के जिला संयोजक साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास बताते हैं कि साइकिल से ईंधन के बचत के अलावा स्वास्थ्य बनता है। आगे उन्होंने बताया कि विश्व साइकिल दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य साइकिल को एक सरल, सस्ता, विश्वसनीय, पर्यावरण के अनुकूल और स्वास्थ्यवर्धक परिवहन साधन के रूप में बढ़ावा देना है। वास्तव में यह दिवस लोगों को स्वच्छ जीवन शैली अपनाने, पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाने, धरती पर कार्बन उत्सर्जन कम करने और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही यह दिवस सड़क सुरक्षा, सस्ती परिवहन व्यवस्था और हरित भविष्य के निर्माण का संदेश भी देता है।


विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर साइकिल भी मन ही मन मुस्कुरा रही होगी कि देखो, आखिर मेरे भी अच्छे दिन आ ही गए। जो कभी आंगन के कोने में धूल फांकती थी, वह आज पेट्रोल-डीजल के महंगाई के कारण सवारियों की मुख्य नायिका बन बैठी है। बिना पेट्रोल, डीजल, बिजली और बैटरी के सिर्फ 'हवा' पर चलने वाला यह वाहन सच में आत्मनिर्भर भारत का सबसे पुराना ब्रांड अंबेसडर है।

 मैकमिलन का यह मितव्ययी आविष्कार कभी घर-घर की शान हुआ करता था। पैडल मारते-मारते न सिर्फ मंजिल मिला करती थी, बल्कि पैरों का व्यायाम भी हो जाता था। मगर आज हालत यह है कि बाइक से जिम जाने वाले महानुभाव वहीं खड़ी साइकिल पर पसीना बहाते हैं।


साइकिल की सबसे बड़ी खूबी है, इसका संयमित चरित्र। इसमें गति और ब्रेक का ऐसा संतुलन है कि दुर्घटना भी सोच-समझकर ही होती है। न हेलमेट का झंझट, न चालान का डर साइकिल से गिरकर चोट लग जाए, तो समाज कहता है- चलो, सीख रहे हो! और अगर बाइक से गिरो, तो वही समाज कहता है- अरे, संभलकर, ज्यादा हुड़हुड़ाओ मत ! रही बात सवारी क्षमता की, तो तकनीकी रूप से यह एक व्यक्ति के लिए बनी है, लेकिन भारतीय जुगाड़ विज्ञान ने इसे पारिवारिक वाहन बना दिया है।इसे सीखने की प्रक्रिया भी किसी आध्यात्मिक साधना से कम नहीं। पहले हाफ पैडल, फिर फुल पैडल, और अंत में

बिना हाथ चलाने का स्टाइल।उस समय गिरना भी उपलब्धि का हिस्सा माना जाता था- घुटनों एवं कोहनी के छिले निशान आज भी बचपन के 'सर्टिफिकेट' की तरह 'पहचान के निशान' हैं।


समय बदला, बाइक आई, फिर कार आई और साइकिल को कोने में धकेल दिया गया, लेकिन जैसे ही पेट्रोल-डीजल के दामों ने जनता की कमर तोड़ी, साइकिल ने फिर से एंट्री मारी, वह भी पूरे स्वाभिमान के साथ। बड़े-बड़े अधिकारी, नेता और सेलिब्रिटी साइकिल चलाते हुए फोटो खिंचवाने लगे हैं। जनता समझ गई कि मामला गंभीर है और अब साइकिल ही सहारा है। आज साइकिल पर्यावरण की रक्षक, स्वास्थ्य की संरक्षक और जेब की हितैषी बनकर सामने खड़ी है। न प्रदूषण, न खर्च, न ट्रैफिक का तनाव- बस पैडल मारिए और जिंदगी आगे बढ़ाइए।

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