नौकरी से सेवानिवृत्ति हो सकती है, लेकिन कर्म, सेवा एवं संस्कार से कभी नहीं
- सुनील कुमार, जिला ब्यूरो चीफ रोहतास
- Jul 05, 2026
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रोहतास। काशी काव्य संगम रोहतास के जिला संयोजक साहित्यकार सुनील कुमार रोहतास ने बताया कि जीवन में प्रत्येक व्यक्ति एक दिन अपनी नौकरी, व्यवसाय या किसी औपचारिक पद से सेवानिवृत्त अवश्य होता है। यह केवल एक पद अथवा दायित्व का परिवर्तन है, जीवन की सार्थकता का अंत नहीं। वास्तविक अर्थों में मनुष्य तब तक सक्रिय है, जब तक उसके भीतर कर्म करने की प्रेरणा, सेवा करने का भाव और संस्कारों की ज्योति प्रज्वलित रहती है।
सेवानिवृत्ति का अर्थ केवल इतना है कि अब कार्यालय का समय समाप्त हुआ है, परंतु समाज, परिवार और राष्ट्र के प्रति हमारी जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं। वर्षों के अनुभव, ज्ञान और जीवन-संघर्ष से अर्जित सीख आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर होती है। यदि वरिष्ठजन अपने अनुभव युवाओं के साथ साझा करें, तो अनेक जीवन सही दिशा प्राप्त कर सकते हैं।
भारतीय संस्कृति में कर्म को ही पूजा माना गया है। मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके पद से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होता है। पद और प्रतिष्ठा समय के साथ बदल जाते हैं, परंतु सेवा, सदाचार, विनम्रता और संस्कार व्यक्ति को जीवनभर सम्मान दिलाते हैं। इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद भी समाज सेवा, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, गौसेवा, धर्मकार्य, जनकल्याण तथा परिवार में संस्कार निर्माण जैसे अनेक क्षेत्र हमारे योगदान की प्रतीक्षा करते हैं।
वृद्धावस्था निष्क्रिय होने का नहीं, बल्कि जीवन के श्रेष्ठ अनुभवों को समाज के हित में समर्पित करने का स्वर्णिम अवसर है। जो व्यक्ति सेवा में आनंद खोज लेता है, उसका जीवन कभी बोझ नहीं बनता। वह स्वयं भी प्रसन्न रहता है और दूसरों के जीवन में भी आशा का दीप जलाता है।
आज आवश्यकता है कि हमारे वरिष्ठजन स्वयं को "रिटायर्ड" नहीं, बल्कि "री-इंस्पायर्ड" अर्थात नई प्रेरणा से परिपूर्ण मानें। वे अपने अनुभवों से युवाओं का मार्गदर्शन करें, बच्चों में नैतिक संस्कार विकसित करें और समाज में सकारात्मक परिवर्तन के वाहक बनें। यही उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
आइए, हम यह संकल्प लें कि नौकरी से भले ही एक दिन सेवानिवृत्त हो जाएँ, परंतु अपने कर्म, सेवा, सदाचार और संस्कारों से कभी सेवानिवृत्त नहीं होंगे। क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, बल्कि उसके द्वारा किए गए श्रेष्ठ कर्म होते हैं। यही कर्म उसे समाज की स्मृतियों में अमर बनाते हैं और यही जीवन की सच्ची सफलता है।


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