बदलती दुनिया के साथ बदल रही हिंदी, तकनीक और वैश्वीकरण ने बढ़ाई चुनौतियां
- कुमार चन्द्र भुषण तिवारी, उप संपादक बिहार
- Sep 14, 2026
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मगध विश्वविद्यालय में ‘बदलती दुनिया, बदलती हिंदी’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित, पुस्तक का विमोचन व भाषण प्रतियोगिता के विजेता सम्मानित
ब्यूरो चीफ प्रेम कुमार की रिपोर्ट
बोधगया। हिंदी दिवस के अवसर पर मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की ओर से सोमवार को ‘बदलती दुनिया, बदलती हिंदी’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य संरक्षक एवं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिलीप कुमार केशरी सहित मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर किया। इसके बाद राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान एवं विश्वविद्यालय के कुलगीत की प्रस्तुति हुई।
संगोष्ठी में सह-संरक्षक एवं कुलसचिव प्रो. बिनोद कुमार मंगलम, मुख्य अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के सुप्रसिद्ध कवि एवं आलोचक प्रो. सदानंद शाही, गया कॉलेज के हिंदी विभाग के प्रो. राम उदय कुमार, कवयित्री ज्योति रीता एवं कवयित्री डॉ. चाहत अन्वी विशिष्ट रूप से उपस्थित रहीं। विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार सिंह ने सभी अतिथियों का स्वागत अंगवस्त्र, पौधा एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर किया।
पुस्तक ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों में मुस्लिम जीवन’ का विमोचन
संगोष्ठी के दौरान स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के शिक्षक डॉ. राकेश कुमार रंजन द्वारा लिखित पुस्तक ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों में मुस्लिम जीवन’ का मंचासीन अतिथियों ने विमोचन किया। अतिथियों ने डॉ. राकेश कुमार रंजन को बधाई देते हुए कहा कि हिंदी साहित्य के विविध पक्षों पर निरंतर शोध एवं लेखन की आवश्यकता है। उन्होंने पुस्तक को हिंदी साहित्य और सामाजिक सरोकारों के अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास बताया।
भाषण प्रतियोगिता के प्रतिभागी व विजेता सम्मानित
कार्यक्रम में 5 से 7 अगस्त तक आयोजित भाषण प्रतियोगिता के प्रतिभागियों एवं विजेताओं को भी सम्मानित किया गया। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को स्वर्ण एवं रजत पदक प्रदान किए गए। सम्मान पाकर विद्यार्थियों में खासा उत्साह दिखा। अतिथियों ने विद्यार्थियों को साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं अकादमिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
हिंदी की ग्रहणशीलता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत : आनंद कुमार सिंह
विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार सिंह ने कहा कि तकनीक, संचार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, जिसका प्रभाव भाषा पर भी पड़ रहा है। हिंदी भी इस परिवर्तन से अछूती नहीं है। नई पीढ़ी के प्रयोग, तकनीकी माध्यमों और वैश्विक संपर्क के कारण हिंदी के शब्द-भंडार एवं अभिव्यक्ति के तरीकों में निरंतर विस्तार हो रहा है।
उन्होंने कहा कि हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी ग्रहणशीलता है। हिंदी ने समय-समय पर विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात कर अपने स्वरूप को समृद्ध किया है। बदलती दुनिया में हिंदी के सामने चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन इन्हीं चुनौतियों में उसके विस्तार की अपार संभावनाएं भी मौजूद हैं।
सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं : बिनोद कुमार मंगलम
कुलसचिव प्रो. बिनोद कुमार मंगलम ने भाषा के प्रति बदलती मानसिकता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी शॉर्ट टर्म और शॉर्टकट को अधिक महत्व देने लगी है, जबकि जीवन में सफलता का कोई वास्तविक शॉर्टकट नहीं होता। निरंतर परिश्रम, अध्ययन और धैर्य ही सफलता का आधार है।
उन्होंने कहा कि हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी को अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अंग्रेजी बोलने को प्रतिष्ठा और आधुनिकता से जोड़ना उचित नहीं है। हिंदी हमारी संवेदना, संस्कृति और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ी भाषा है। हिंदी को सम्मान देने का अर्थ किसी दूसरी भाषा का विरोध करना नहीं, बल्कि अपनी भाषा और सांस्कृतिक पहचान के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।
उन्होंने कहा कि तकनीक और वैश्वीकरण के दौर में हिंदी के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों हैं। हिंदी को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और डिजिटल माध्यमों से जोड़कर समृद्ध बनाने की जरूरत है।
भाषा संवेदनाओं और संस्कृति की पहचान : डॉ. चाहत अन्वी
कवयित्री डॉ. चाहत अन्वी ने कहानी के माध्यम से अपनी बात रखते हुए कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि वह हमारी संवेदनाओं, स्मृतियों, संस्कृति और सामाजिक पहचान को भी अपने भीतर समेटे रहती है। डिजिटल युग में हिंदी की उपयोगिता लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, शिक्षा एवं संचार के नए माध्यमों में हिंदी की उपस्थिति तेजी से बढ़ी है। आवश्यकता है कि नई पीढ़ी हिंदी को आधुनिक तकनीक से जोड़े।
काव्य पाठ से जीवंत हुआ साहित्यिक माहौल
कवयित्री ज्योति रीता ने काव्य पाठ के माध्यम से हिंदी की संवेदनशीलता, आत्मीयता एवं व्यापकता को अभिव्यक्त किया। उनकी प्रस्तुति ने संगोष्ठी के साहित्यिक वातावरण को और जीवंत बना दिया। श्रोताओं ने काव्य पाठ की सराहना की।
‘बदलती दुनिया, बदलती हिंदी’ वर्तमान समय की वास्तविकता : दिलीप कुमार केशरी
कुलपति प्रो. दिलीप कुमार केशरी ने हिंदी दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि बदलती दुनिया में हिंदी का स्वरूप भी निरंतर बदल रहा है। भाषा परिवर्तनशील होती है और समय के साथ उसमें नए शब्द, नए प्रयोग एवं नई अभिव्यक्तियां जुड़ती रहती हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदी की विशेषता उसकी व्यापकता और समावेशी प्रकृति है। हिंदी भारतीय समाज की विविधता, संवेदना और संस्कृति को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है। ‘बदलती दुनिया, बदलती हिंदी’ केवल संगोष्ठी का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान समय की वास्तविकता है। हिंदी नए शब्दों को स्वीकार कर रही है और नए माध्यमों में अपनी जगह बना रही है। आवश्यकता है कि इस परिवर्तन को समझते हुए हिंदी को भविष्य की भाषा के रूप में विकसित करने में अपनी भूमिका निभाई जाए।
एआई के दौर में संवेदना और विवेक बचाए रखना जरूरी : सदानंद शाही
मुख्य अतिथि प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि आज दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के दौर से गुजर रही है। एआई ने जीवन और कार्यशैली को व्यापक रूप से प्रभावित किया है, लेकिन तकनीक के प्रति अत्यधिक निर्भरता गंभीर चिंता का विषय है। तकनीक का उपयोग मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे मनुष्य की संवेदना, विवेक और स्वतंत्र चिंतन पर हावी होने देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बाजार का नया उपनिवेशवाद और अंग्रेजी भाषा के प्रति बढ़ती रुचि हिंदी के बदलते स्वरूप का संकेत है। वैश्वीकरण और बाजार की शक्तियों ने भाषा, संस्कृति और सोच को भी प्रभावित किया है। ऐसे समय में हिंदी के सामने अपनी पहचान और मौलिकता बनाए रखते हुए आधुनिकता के साथ कदमताल करने की चुनौती है।
भाषा का बदलना उसके जीवंत होने का प्रमाण : राम उदय कुमार
गया कॉलेज के आचार्य प्रो. राम उदय कुमार ने कहा कि भाषा का बदलना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसके जीवंत और गतिशील होने का प्रमाण है। आवश्यकता इस बात की है कि बदलाव की दिशा हमारे सामाजिक एवं सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़ी रहे।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. परम प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन किया। चांदनी बसोया ने संगीतमय प्रस्तुति दी। संगोष्ठी में हिंदी की वर्तमान स्थिति, वैश्वीकरण, तकनीकी विकास, सोशल मीडिया, शिक्षा, साहित्य और नई पीढ़ी के बीच हिंदी के बदलते प्रयोग पर विस्तार से चर्चा हुई।
इस अवसर पर हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. राकेश कुमार रंजन, डॉ. अनुज कुमार तरुण, इतिहास विभाग के प्रो. मनीष कुमार सिन्हा, संस्कृत विभाग के प्रो. मुनेश्वर प्रसाद, डॉ. ममता मेहरा, पीएम एंड आईआर विभाग के डॉ. राजेश कुमार, उर्दू विभाग के डॉ. जियाउल्लाह, प्राचीन इतिहास विभाग के डॉ. अनूप भारद्वाज, डॉ. आलोक कुमार सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक, विद्यार्थी, शोधार्थी एवं हिंदी साहित्य से जुड़े लोग उपस्थित रहे।


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