भिवंडी का पावरलूम उद्योग गहरे संकट में मजदूरों का पलायन जारी
- महेंद्र कुमार (गुडडू), ब्यूरो चीफ भिवंडी
- Apr 03, 2026
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भिवंडी। भिवंडी का पावरलूम उद्योग इन दिनों अभूतपूर्व आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है, जिसका सीधा असर यहां के कपड़ा उद्योग पर पड़ा है। कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल और तैयार कपड़ों की घटती मांग ने उद्योग की कमर तोड़ दी है।
उद्योग से जुड़े व्यापारियों के अनुसार, कपड़ा निर्माण में उपयोग होने वाले यार्न (धागे) के दाम में 25 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है, जबकि तैयार कपड़े के भाव स्थिर बने हुए हैं। परिणामस्वरूप, उत्पादकों को लागत से कम कीमत पर माल बेचने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। भिवंडी, जिसे एशिया की सबसे बड़ी पावरलूम नगरी माना जाता है, में लगभग 7 लाख पावरलूम संचालित होते हैं, जो देश के कुल उत्पादन का करीब 33 प्रतिशत हिस्सा हैं। यहां का वार्षिक कपड़ा कारोबार लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का है और प्रतिदिन करीब 420 लाख मीटर ग्रे कपड़ा तैयार कर देशभर में भेजा जाता है। इस उद्योग पर हजारों लघु इकाइयां और लाखों मजदूर निर्भर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सिंथेटिक, पॉलिस्टर और नायलॉन धागों का निर्माण पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल से होता है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के चलते यार्न महंगा हो गया है। इसके अलावा, माल ढुलाई में देरी और बढ़े हुए भाड़े ने उत्पादन लागत को और बढ़ा दिया है। पिछले एक महीने में ही धागे की कीमतों में 20 से 25 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस बीच, एक और गंभीर समस्या सामने आई है। भिवंडी में पहले से ही प्लास्टिक के मोती (बीड्स) बनाने वाले कई छोटे कारखाने आर्थिक दबाव के कारण बंद हो चुके हैं। ये उद्योग भी बड़ी संख्या में स्थानीय और बाहरी मजदूरों को रोजगार देते थे। अब पावरलूम उद्योग पर संकट गहराने से स्थिति और बिगड़ गई है।
कपड़ा व्यवसाय में गिरावट और काम की अनिश्चितता के चलते मजदूरों का पलायन तेज हो गया है। बड़ी संख्या में मजदूर अपने-अपने गृह राज्यों की ओर लौटने लगे हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि जल्द ही हालात नहीं सुधरे, तो श्रमिकों की भारी कमी से उत्पादन पूरी तरह ठप हो सकता है। जॉब वर्क पर आधारित इस उद्योग में पहले से बुक ऑर्डर अब घाटे का सौदा साबित हो रहे हैं। व्यापारी कीमतों में अस्थिरता के कारण नया स्टॉक जमा करने से बच रहे हैं, जिससे नए ऑर्डर भी घटते जा रहे हैं। खरीदारों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे बाजार में सुस्ती छा गई है। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि यही हालात बने रहे, तो पावरलूम इकाइयों में बड़े पैमाने पर तालाबंदी की नौबत आ सकती है। इसका असर न केवल भिवंडी, बल्कि मालेगांव और इचलकरंजी जैसे प्रमुख कपड़ा केंद्रों पर भी पड़ेगा, जहां लाखों लोगों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर है। कुल मिलाकर, कच्चे माल की महंगाई, घटती मांग, छोटे उद्योगों के बंद होने और मजदूरों के पलायन ने भिवंडी के पावरलूम उद्योग को गंभीर संकट में डाल दिया है। उद्योग को इस स्थिति से उबारना अब एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।


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