वन टाइम इन्वेस्टमेंट, लाईफ टाईम गेन

भिवंडी ।। देश सहित राज्यों में प्रिंट तथा सोशल मीडिया के बूम का रौब जमाने वाले ब्लैकमेलर पत्रकारों को आंतक छाया हुआ है.अगर इनके विरूद्ध कार्रवाई नहीं हुई तो पत्रकारिता का स्तर गिरने से नहीं बचाया जा सकता है.तमाम शहरों में पिछले कुछ समय से प्रिंट तथा सोशल मीडिया के ब्लैकमेलर पत्रकारों की भरमार हो गई है.ऐसे - ऐसे पत्रकार अथवा संपादक है जो पूरी तरह से शिक्षा विहीन है.यही नहीं इनका अखबार भी साल में सिर्फ दीपावली अथवा ईद पर ही छपता है और सोशल मीडिया पर न्युज जैसा फर्जी विडियो बनाकर वायरल करके संपादक बने रहते है.इनकी स्थिति वन टाइम इन्वेस्टमेंट, लाईफ टाईम गेन वाली है.अर्थात जिनका पेपर पहले तो निकलता नहीं अगर निकलता भी है तो एक या फिर दो अंक वह भी साल भर में एक अथवा दो बार। ऐसे पत्रकार सुबह ही सूट टाई पहनकर घरों से निकल जाते है दिनभर शहर दर शहर भ्रमण कर सिर्फ वसूली करना ही लक्ष्य व कर्तव्य समझते है।

ऐसे मीडिया कर्मी शिकायत न करने के बदले रेत माफिया, मटका, दारु अड्डा, तेल माफिया, भू माफिया आदि अवैध धंधा मालिकों से पैसे की मांग करते है.जिसने इन्हें पैसा दिया वह साधु ,बल्कि सब डाकू ‌!शहर में ऐसे ब्लैकमेलर पत्रकारों की कोई कमी नहीं.जिनका अखबार या फिर बूम महज वाट्स ऐप और फेसबुक पर ही चलता है.लेकिन उनकी धौंस संसद भवन के पत्रकारों से कहीं कम नहीं है.हालात यह हैं कि ऐसे धौसबाज बूम माफियाओं ने तमाम स्थानीय पत्रकार संगठनों में भी अपनी दस्तक दे दी है.लिहाजा शहर के प्रतिष्ठित पत्रकारों ने ऐसे संगठनों से दूरी बना ली है.आलम यह है कि छोटे-बडे नेता-अधिकारी, समाजसेवी, कारोबारी समेत सभी तबकों के प्रेस कांफ्रेंस में ऐसे ही पत्रकार हावी रहते है.जबकि प्रतिष्ठित अखबारों अथवा चैनलों के पत्रकार महज मूकदर्शक की भूमिका में ही नजर आते है जिसके कारण शहर के अधिकांश प्रतिष्ठित पत्रकारों ने प्रेस कांफ्रेंसो से दूरी बना ली है।

ऐसा यूं ही नहीं है इसके पीछे कई स्थापित पत्रकारों का भी मूक समर्थन है.जो खुद को सफेदपोश रखते हुए ऐसे लोगों की आड़ में अपने स्वार्थ की रोटियां सेंक रहे है.जिनकी जानकारी भी सभी को है.दुनिया में अच्छे-बुरे दोनों प्रवृत्ति के लोग है.जिन पर बारीक निगाह ऊपर वाले की है.ऊपर वाले से बड़ा कोई नहीं है.जो लोग इन ब्लैकमेलर पत्रकार को हड्डी डालते है अथवा समर्थन करते है.वो कितना भी बुरा काम करें उसके खिलाफ ये कभी शिकायत नहीं करते लेकिन हड्डी डालना जैसे ही बंद करते है उनके खिलाफ इनकी शिकायतों का दौर शुरू हो जाता है।  

कुछ बेरोजगार, युवा भी इस क्षेत्र में काई भाषाओं में पत्रकारिता कर धर्मगुरु व नेताओं के आर्शीवाद, उनके साथ फोटो की सेल्फी लेकर अपनी रौंब झारते रहते है.यही नहीं अब पानी माफिया व मिलावटी दूध का कालाबाजारी करने वाले भी इसी सोशल मीडिया के बूम के सहारे शहरों में अवैध धंधा कर रहे है ऐसे पत्रकारों की जब पोल खुलती है तो वें अपने आप को पत्रकार साबित करवाने के लिए छोटे - मोटे अखबारों में शहर के प्रतिष्ठित पत्रकारों से खबरें भीख मांगकर फॉरवर्ड कर बाई नेम खबरें छपवाकर पत्रकार बनें रहते है जिसके कारण इनका अवैध धंधा भी फलताफूलता रहता है.ऐसे पत्रकारों का मानना है कि अगर इस क्षेत्र में वन टाइम इन्वेस्टमेंट कर दो तो लाईफ टाईम कमाई होती रहेगी. भिवंडी शहर भी इससे अछूता नहीं है.क्या ऐसे पत्रकारों के खिलाफ शासन व प्रशासन के अधिकारी कार्रवाई करेंगे.इस प्रकार का प्रश्न भी अब नागरिकों द्वारा उठाया जाने लगा है।

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