
भिवंडी ग्रामीण विधानसभा सीट: 2024 के चुनाव में असली और नकली शिवसेना की प्रतिष्ठा दांव पर
- महेंद्र कुमार (गुडडू), ब्यूरो चीफ भिवंडी
- Sep 30, 2024
- 493 views
भिवंडी। भिवंडी ग्रामीण विधानसभा सीट पर आगामी 2024 के चुनावों का रंग अब और गहरा हो गया है। महाराष्ट्र की राजनीति में हाल ही में हुए बदलावों के कारण इस सीट की लड़ाई पहले से कहीं अधिक दिलचस्प हो गई है। खासकर जब शिवसेना अब दो धड़ों में बंट चुकी है – एक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना (यूबीटी) और दूसरी एकनाथ शिंदे की शिवसेना (शिंदे गुट)।
भिवंडी ग्रामीण: शिवसेना का किला, लेकिन इस बार कौन?
भिवंडी ग्रामीण सीट पर शिवसेना का वर्चस्व 2014 से बना हुआ है। जब से शिवसेना के उम्मीदवार शांताराम तुकाराम मोरे ने जीत का परचम लहराया था। 2019 में भी उन्होंने इस सीट पर बड़ी जीत दर्ज की, मनसे के उम्मीदवार को करीब 44 हजार वोटों से हराकर अपनी पकड़ और मजबूत की।लेकिन 2024 के चुनाव इस सीट पर शिवसेना के लिए एक नई परीक्षा होंगे।
शिवसेना की पहचान की लड़ाई :
इस बार चुनावी दांव पर सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि शिवसेना की असली पहचान है। 2024 में भिवंडी ग्रामीण सीट पर असली और नकली शिवसेना के बीच एक दिलचस्प मुकाबला होने की पूरी संभावना है। दोनों धड़े खुद को असली शिवसेना के रूप में पेश करने की कोशिश करेंगे,लेकिन जनता की नज़र में "असली शिवसेना" कौन है, यही सबसे बड़ा सवाल है। शिंदे गुट जो महाराष्ट्र सरकार चला रहा है। खुद को शिवसेना की असली धारा के रूप में स्थापित करने में जुटा है। वहीं उद्धव ठाकरे का यूबीटी गुट अपनी परंपरा और विचारधारा पर दावा कर रहा है। इस लड़ाई में जनता का फैसला ही अंतिम सत्य होगा और भिवंडी ग्रामीण जैसी सीटें इस फैसले का बड़ा हिस्सा बनेंगी।
शांताराम मोरे की भूमिका :
शांताराम तुकाराम मोरे जिन्होंने 2014 और 2019 में यहां जीत हासिल की थी। इस बार फिर से मैदान में उतर सकते है। वह इस क्षेत्र में एक लोकप्रिय और प्रभावी नेता माने जाते है लेकिन यह देखना होगा कि वे शिवसेना के किस धड़े के साथ चुनाव लड़ेंगे। उनके समर्थन का झुकाव चुनावी परिणामों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
लोकसभा संपर्क प्रमुख व पूर्व विधायक रूपेश म्हात्रे और महादेव घाटाल की प्रमुख भूमिका ::
भिवंडी ग्रामीण यह सीट शिवसेना की बाल किला है। लोकसभा संपर्क प्रमुख व पूर्व विधायक रूपये म्हात्रे और आदिवासी नेता महादेव घाटाल इस सीट वापस आपने खेमे में लाने व विद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए चक्रव्यूह की रचना की है इसे शांताराम मोरे को भेंदना आसान नहीं होगा।
मनसे का भी प्रभाव :
इस सीट पर मनसे लगातार दूसरे व तीसरे नंबर पर रहकर शिवसेना व भाजपा को टक्कर देती रही है। वही पर शिवसेना व राकांपा में बिखराव का फायदा साद सकती है। अगर इंजन चला तो शिवसेना शिंदे गुट के लिए एक बड़ी मुसीबत पैदा कर सकती है।
वोट का समीकरण :
वर्ष 2019 में भाजपा के सावरा विष्णु राम को 46,996 मत और राकांपा के पाटिल शांताराम दुंडाराम को 44,804 वोट मिले थे। मनसे के दशरथ पाटिल को 36,680 वोट पड़े। इसी तरह वर्ष 2014 में शिवसेना के शांताराम मोरे ने 57,082 वोट लेकर भाजपा के पाटिल शांताराम डुंडाराम को मात दी। पाटिल शांताराम को 47,922 वोट मिला था। वर्ष 2019 में शांताराम मोरे ने दूसरी बार विजय हासिल की और मनसे की शुभागी रमेश गोवारी को भारी मतों से हराया था। किन्तु इस बार पहली वाली शिवसेना नहीं है। वर्ष 2019 में राकांपा ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए माधुरी शंशिकांत म्हात्रे को 33,571 वोट हासिल हुए थे।
वोटों का समीकरण :
इस सीट पर वर्ष 2009 चुनाव के दरमियान कुल वोटर्स की संख्या 2,39,230 थी। वर्ष 2014 में यह संख्या बढ़ कर 2,62,433 पर पहुँच गई । इसी तरह वर्ष 2019 के दौरान 2,89,361 पर पहुँच चुकी है। सितंबर 2024 के आंकड़े के अनुसार अव 3,31,367 पर पहुँच चुका है। जिसमें स्त्री 1,59,785 पुरूष 1,71,670 और अन्य 12 का समावेश है। इसका असर भी वर्तमान विधायक शांताराम मोरे को पड़ सकता है।
जातीय समीकरण: कौन साधेगा आदिवासी और पाटिल वोटर ?
भिवंडी ग्रामीण सीट एसटी आरक्षित है।जिसमें आदिवासी वोटरों की निर्णायक भूमिका होती है। यहां कुल वोटर्स में से 26.36 प्रतिशत आदिवासी समुदाय से आते है। जबकि 20 प्रतिशत पाटिल समुदाय के है। पिछले चुनावों में देखा गया है कि जो पार्टी इन दोनों समुदायों को अपने पाले में कर लेती है। उसे जीत की राह पर चलना आसान हो जाता है। इस बार भी यही समीकरण मुख्य भूमिका निभाएंगे, और शिवसेना के दोनों धड़े इन वोटरों को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश करेंगे।
2024 का मुकाबला: असली बनाम नकली का नया अध्याय
2024 का चुनाव सिर्फ भिवंडी ग्रामीण सीट के लिए नहीं, बल्कि शिवसेना की विरासत और असली नेतृत्व की पहचान के लिए भी अहम होगा। यह देखना दिलचस्प रहेगा कि जनता किसे असली शिवसेना का नेतृत्वकर्ता मानती है। शिवसेना के विभाजन के बाद, यह चुनाव उन मुद्दों पर केंद्रित होगा जो सीधे तौर पर शिवसेना की विचारधारा और नेतृत्व से जुड़े हैं। क्या जनता उद्धव ठाकरे की पारंपरिक शिवसेना के साथ जाएगी, या शिंदे गुट, जो वर्तमान में सत्ता में है, को अपनी असली शिवसेना मानेगी ?
इस सीट पर हर वोट की कीमत बढ़ गई है, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ एक विधानसभा सीट जीतने की नहीं, बल्कि एक पूरी पार्टी की पहचान को सुरक्षित रखने की है। 2024 के इस महासंग्राम में भिवंडी ग्रामीण की जनता तय करेगी कि असली शिवसेना कौन है और कौन नकली।
रिपोर्टर