जुमलों की राजनीति में उलझी शिवसेना, कार्यकर्ताओं में बढ़ती नाराजगी
- Rohit R. Shukla, Journalist
- Jan 14, 2026
- 220 views
कल्याण। “राजा का बेटा राजा नहीं बनता, बल्कि मेहनती और एकनिष्ठ कार्यकर्ता ही नेतृत्व का असली हकदार होता है”—सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे द्वारा बार-बार दोहराया गया यह कथन जमीनी हकीकत में खोखला साबित होता नजर आ रहा है। हालिया नगरसेवक चुनाव में शिवसेना द्वारा दिए गए टिकटों पर नजर डालें तो पार्टी की कथनी और करनी के बीच साफ विरोधाभास दिखाई देता है।
उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने भी सार्वजनिक मंचों से यह बयान दिया था कि अब वारिस का बेटा नहीं, बल्कि पार्टी का कार्यकर्ता नेता बनेगा। लेकिन चुनावी मैदान में उतारे गए उम्मीदवारों की सूची ने इन दावों की पोल खोल दी है। जिन सीटों पर महिला आरक्षण लागू है, वहां सीधे नेताओं की पत्नियों को टिकट देकर पार्टी ने यह संकेत दे दिया कि सत्ता और टिकट अब भी “राजा के घर” तक ही सीमित हैं।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों और जमीनी कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय बड़े नेता कार्यकर्ताओं को आगे कर उनका इस्तेमाल करते हैं, उन्हें बड़े-बड़े सपने और नेतृत्व का लॉलीपॉप दिखाया जाता है, लेकिन टिकट वितरण के वक्त वही पुरानी परिवारवादी राजनीति हावी हो जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शिवसेना में कार्यकर्ताओं की मेहनत केवल प्रचार और भीड़ जुटाने तक सीमित रह गई है।
सूत्रों के अनुसार, कई कार्यकर्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर खुलकर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि हर चुनाव में नए जुमले और नए आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे वादे हवा हो जाते हैं। सांसद चुनाव से पहले हिंदी भाषी भवन निर्माण का मुद्दा उठाकर वोट बटोरे गए, जबकि नगरसेवक चुनाव में “कार्यकर्ता ही नेता बनेगा” का नारा देकर फिर से कार्यकर्ताओं को गुमराह किया गया।
इस दोहरी नीति का असर अब जनता के बीच भी साफ दिखने लगा है। स्थानीय नागरिकों में भी नेताओं के प्रति असंतोष पनप रहा है। कुछ मतदाताओं ने खुलकर नोटा को वोट देने की बात कही है, जबकि कई लोगों का कहना है कि वे पार्टी या बड़े नेताओं को नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के पुराने नगरसेवकों के कार्यों और उनके व्यवहार को देखकर मतदान करेंगे।
कुल मिलाकर, शिवसेना की नेतृत्व नीति और टिकट वितरण को लेकर उठ रहे सवालों ने पार्टी के भीतर असंतोष की आग भड़का दी है। यदि समय रहते इन नाराज कार्यकर्ताओं और जनता की भावनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो इसका असर आने वाले चुनावी नतीजों में साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।


रिपोर्टर