आठ साल से ताला, संस्कृति पर ताला—मीना ताई ठाकरे ऑडिटोरियम की उपेक्षा पर उठ रहे सवाल...

भिवंडी की सांस्कृतिक पहचान खतरे में, शासन–प्रशासन पर बढ़ा दबाव


भिवंडी। शहर के हृदयस्थल में स्थित मीना ताई ठाकरे ऑडिटोरियम पिछले आठ वर्षों से जर्जरता और प्रशासनिक लापरवाही का बोझ उठाते हुए बंद पड़ा है। कभी भिवंडी की सांस्कृतिक धड़कन माना जाने वाला यह प्रतिष्ठित सभागृह अब खंडहर में बदलता जा रहा है। 2017 में एक कार्यक्रम के दौरान तकनीकी खराबी सामने आने के बाद इसे असुरक्षित मानकर बंद कर दिया गया था। इसके बाद से न तो मरम्मत समय पर शुरू हुई और न ही सांस्कृतिक गतिविधियाँ पटरी पर लौटीं, जिससे भिवंडी की पहचान पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।

सांस्कृतिक केंद्र से सूनेपन तक का सफर.....

1 मार्च 1996 को तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री गणेश नाईक द्वारा उद्घाटित इस ऑडिटोरियम में कभी नाटक, संगीत, साहित्यिक आयोजन और शैक्षणिक कार्यक्रमों की रौनक रहती थी। शहर के स्कूल-कॉलेजों से लेकर सामाजिक संस्थाओं तक—सभी के लिए यह सर्वोच्च मंच था। लेकिन वर्षों की उपेक्षा और रखरखाव के अभाव ने इसकी संरचना को कमजोर कर दिया।

स्थानीय नागरिकों का आरोप. है कि भिवंडी पालिका ने इसे पुनर्जीवित करने के बजाय इसकी कीमती जमीन को व्यावसायिक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में बदलने का प्रयास किया था, जिसका नागरिकों ने संगठित विरोध किया। बढ़ते आक्रोश के बाद प्रशासन को आखिरकार मरम्मत की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े।

लागत बढ़ती रही, फाइलें घूमती रहीं......

मरम्मत लागत ने भी प्रशासनिक अस्थिरता का सच उजागर कर दिया—

2015 में अनुमान: 65 लाख रुपये

2017 में बढ़कर: 8 करोड़ रुपये

2020 में जिला नियोजन समिति ने मंजूर किए: 10.57 करोड़ रुपये

तत्कालीन अभिभावक मंत्री (अब उपमुख्यमंत्री) एकनाथ शिंदे ने बजट को हरी झंडी दी, लेकिन परियोजना टेंडर प्रक्रियाओं और तकनीकी अड़चनों में फंसकर धूल खाती रही। अप्रैल 2022 में छह कंपनियों ने बोली लगाई। जांच में नाशिक की आर एंड के इंफ्रा की बोली सबसे कम पाई गई, लेकिन कंपनी ने काम शुरू नहीं किया। नगर निगम ने नोटिस जारी कर 12 अगस्त 2022 को कंपनी की 5.27 लाख रुपये की जमानत राशि जब्त कर ली।

फिर नया टेंडर, फिर वही कहानी.....

22 फरवरी 2023 को 15.50 करोड़ रुपये की नई अनुबंध प्रक्रिया पूरी की गई। इसमें 75% बजट राज्य सरकार और 25% बीएनसीएमसी को देना था। लेकिन राज्य सरकार ने शुरुआती तौर पर सिर्फ 1.5 करोड़ रुपये जारी किए, जिसके बाद काम फिर ठप पड़ गया। लगातार पत्राचार के बाद हाल ही में 4 करोड़ रुपये और जारी हुए, तब जाकर निर्माण कार्य ने गति पकड़ी।बीएनसीएमसी के इंजीनियर सचिन नाईक का कहना है कि अधिकांश सिविल कार्य पूरा हो चुका है। अब मंच, साउंड सिस्टम, आधुनिक लाइटिंग, नई सीटें, और अन्य तकनीकी सुविधाएँ स्थापित की जानी हैं। “हम इसे आधुनिक सुविधाओं से लैस कर रहे हैं। अब काम में तेजी आएगी,” उन्होंने कहा।

“यह सिर्फ इमारत नहीं, हमारी प्रतिभा का घर है”

स्थानीय रंगकर्मी और सांस्कृतिक कार्यकर्ता सुल्तान कुरैशी ने इस लंबी देरी को भिवंडी की सांस्कृतिक हत्या करार दिया। उनका कहना है, “आठ साल तक शहर को उसके इकलौते सभागृह से वंचित रखना गंभीर प्रशासनिक विफलता है। नई पीढ़ी मंच के बिना कैसे आगे बढ़ेगी? सरकार और नगर निगम दोनों को जवाब देना होगा।”

सवाल शासन से—कब लौटेगी भिवंडी की सांस्कृतिक धड़कन?.......

लगभग एक दशक से बंद यह सभागृह सिर्फ एक ढांचा नहीं, बल्कि भिवंडी की सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। नागरिकों का कहना है कि यदि फंड, टेंडर और फाइलों की धीमी गति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में शहर की सांस्कृतिक विरासत पूरी तरह मिट सकती है।

भिवंडी के लोग अब यह आश्वासन चाहते हैं कि मीना ताई ठाकरे ऑडिटोरियम का काम न केवल पूरा होगा, बल्कि तय समय सीमा में होगा—ताकि शहर की खोई सांस्कृतिक चमक दोबारा लौट सके। शासन और प्रशासन पर दबाव बढ़ता जा रहा है, और अब भिवंडी एक निर्णायक जवाब की प्रतीक्षा कर रहा है।

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