कुर्सी जाएगी या बचेगी ? ओबीसी विवाद में घिरे उपमहापौर

जाति प्रमाणपत्र विवाद बना सियासी तूफान, उप महापौर पर लटकी तलवार


भिवंडी। भिवंडी- निजामपुर महानगरपालिका के उपमहापौर तारिक बारी मोमिन की सदस्यता पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। ओबीसी जाति प्रमाणपत्र को लेकर लगे फर्जीवाड़े के आरोपों ने शहर की सियासत में हलचल मचा दी है। मामले की शिकायत कोकण विभागीय जाति सत्यापन समिति तक पहुंच चुकी है, जहां सुनवाई जारी है।

पूर्व नगरसेवक इस्माईल रंगरेज ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि तारिक मोमिन द्वारा चुनाव के दौरान प्रस्तुत किया गया ओबीसी प्रमाणपत्र बोगस है। उन्होंने इस संबंध में विस्तृत शिकायत दर्ज कराते हुए करीब 25 दस्तावेज भी पेश किए हैं, जिनमें मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड और जमीन के रिकॉर्ड शामिल हैं। इन दस्तावेजों में ‘मोमिन’ उपनाम का कोई उल्लेख नहीं होने का दावा किया गया है।

रंगरेज के अनुसार, तारिक मोमिन के पूर्वज उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के निवासी हैं और उनके परिवार के किसी भी आधिकारिक दस्तावेज में ‘मोमिन’ जाति का उल्लेख नहीं मिलता। ऐसे में भिवंडी तहसीलदार कार्यालय से प्राप्त ओबीसी प्रमाणपत्र की वैधता पर सवाल उठना लाजिमी है। मामले को और गंभीर बनाते हुए यह भी आरोप लगाया गया है कि मोमिन द्वारा अपने पिता अब्दुल बारी के नाम पर छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) से प्राप्त जाति प्रमाणपत्र भी संदिग्ध है। नियमों के मुताबिक, जाति सत्यापन के लिए 1967 से पूर्व का महाराष्ट्र से संबंधित ठोस प्रमाण आवश्यक होता है, लेकिन अब तक ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है।

सूत्रों के मुताबिक, इस मामले में अब तक दो से तीन बार सुनवाई हो चुकी है, लेकिन तारिक मोमिन की ओर से कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया है। ऐसे में उनका जाति प्रमाणपत्र रद्द होने और नगरसेवक पद जाने की आशंका बढ़ गई है। हालांकि, यह भी सामने आया है कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों ने ‘मोमिन’ जाति के आधार पर ओबीसी प्रमाणपत्र हासिल किए हैं और कुछ को वैधता प्रमाणपत्र भी मिला है। बावजूद इसके, आवश्यक ऐतिहासिक दस्तावेजों की अनुपस्थिति ने पूरे मामले को संदिग्ध बना दिया है। इस मामले के सामने आने के बाद भिवंडी की राजनीति में भूचाल आ गया है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो न सिर्फ उपमहापौर पद बल्कि नगरसेवक की सदस्यता भी खतरे में पड़ सकती है। अब सबकी नजरें जाति सत्यापन समिति के फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले दिनों में भिवंडी की राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

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