भिवंडी में जर्जर इमारतों पर सियासी घमासान, महासभा में उठे गंभीर सवाल

ठेकेदार का ठेका मुद्दत समाप्त होने के बाद भी काम जारी

कर्मचारी की तीन बार बदली के बाद फिर हो जाती है वापसी

मानसून के पहले होता है धंधा


भिवंडी। भिवंडी-निजामपुर शहर महानगर पालिका में जर्जर और अतिजर्जर इमारतों का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। भाजपा नेता संतोष एम. शेट्टी द्वारा महापौर को पत्र लिखकर इस विषय को महासभा में उठाने की मांग के बाद आज इस पर जोरदार चर्चा हुई।महासभा में नगरसेवक संतोष शेट्टी ने शहर की खस्ताहाल इमारतों को लेकर प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि शहर में बड़ी संख्या में जर्जर और अतिजर्जर इमारतें मौजूद हैं, जो कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती हैं। इन इमारतों में रह रहे नागरिकों की जान जोखिम में है, बावजूद इसके अब तक इन्हें खाली कराने या पुनर्विकास की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए है। शेट्टी ने आरोप लगाया कि कई इमारतों की स्थिति अत्यंत खराब होने के बावजूद संबंधित विभाग कार्रवाई में ढिलाई बरत रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में बिल्डरों और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण पुनर्विकास की प्रक्रिया अटकी हुई है, जिससे आम नागरिकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

वहीं, नगरसेवक मनोज काटेकर ने प्रभाग समिति क्रमांक तीन में कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि एक बीट निरीक्षक की बार-बार बदली के आदेश जारी होते हैं, लेकिन अगले ही दिन उन्हें रद्द कर दिया जाता है। उन्होंने संबंधित अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। नगरसेवक हस्नैन फारूकी ने एक जर्जर इमारत का उदाहरण देते हुए बताया कि इमारत को तोड़े हुए आठ साल बीत चुके हैं, लेकिन अब तक जमीन का कोई विकास नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि कई प्रभावित लोग आज भी पालिका के पंचनामे लेकर भटक रहे हैं, जबकि कुछ की मृत्यु भी हो चुकी है।इस दौरान ठेकेदारों के कामकाज को लेकर भी सवाल उठे। स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि जर्जर इमारतों को तोड़ने वाले ठेकेदार का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद उसे दोबारा ठेका दिया जा रहा है। नगरसेवक बालाराम चौधरी ने पालिका अधिकारियों और ठेकेदारों पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए इसे एक ‘रैकेट’ बताया। नगरसेवक कमलाकर पाटिल ने कहा कि हर साल मानसून के दौरान जर्जर इमारतों को तोड़ने का ‘धंधा’ शुरू हो जाता है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते। महासभा में उठे इन गंभीर सवालों के बाद अब देखना होगा कि प्रशासन इस दिशा में क्या ठोस कार्रवाई करता है और शहरवासियों को कब तक इस खतरे से राहत मिलती है।

रिपोर्टर

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