नवरात्र और आयुर्वेद



बिहार : सनातन संस्कृति के साधकों का महान पर्व चैत्र नवरात्र  इस वर्ष 9 अप्रैल से 17 अप्रैल तक है । आज ही से हम हिन्दू नववर्ष का प्रारम्भ भी मानते हैं ।

अपने घर-द्वार को नव पल्लव के तोरण से सजावट कर, नया घट स्थापना करते हुए नवरात्र व्रत का उत्सव प्रारम्भ करते हैं ।

चैत्र नवरात्र का धार्मिक दृष्टि से खास महत्व है क्योंकि चैत्र नवरात्र के पहले दिन आदिशक्ति पराम्बा भगवती प्रकट हुई थी और भगवती देवी के कहने पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया था। और आज ही के दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष शुरु होता है ।


नवदुर्गा सनातन धर्म में भगवती माता दुर्गा जिन्हे आदिशक्ति जगत जननी जगदम्बा भी कहा जाता है, भगवती के नौ मुख्य रूपों  की मान्यता है जिनकी विशेष पूजा व साधना नवरात्रि के दौरान किया जाता है ।इन (नव )दुर्गा देवियों को पापों को हरने वाली,दुख-विनाशिनी कहा जाता है, हर देवी के अलग अलग वाहन हैं, अस्त्र शस्त्र हैं परन्तु मूलतः सब एक ही हैं और सभी पराम्बा भगवती दुर्गा जी से ही प्रकट होती है।


चैत्र नवरात्रि का महत्व?

शास्त्रों में चैत्र नवरात्रि का विशेष महत्व है। माना जाता है कि नौ दिनों तक पड़ने वाले नवरात्रि में व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक मजबूत मिलती है। व्यक्ति की अध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। इसके साथ ही व्यक्ति को काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ जैसी चीजों से मुक्ति मिल जाती है और व्यक्ति का मन और तन शुद्ध हो जाता है और बुद्धि भी ठीक ढंग से काम करने लगती है।


नवरात्रि का महत्व धार्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विशेष मान्यता रखा जाता है। यह हिन्दू त्योहार नवरात्रि देवी दुर्गा की पूजा और आराधना के लिए समर्पित है। नवरात्रि में मां दुर्गा अपनी अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन करती हैं। वह नौ दिनों तक नौ रूपों में प्रकट होती हैं, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है। इन रूपों के माध्यम से वह असुरों और बुराई को पराजित करती हैं और धर्म और न्याय की विजय की प्रतिष्ठा करती हैं। 


नवरात्रि भारतीय समाज में समरसता, एकता, और सामरिक भावना को प्रोत्साहित करता है।

इस त्योहार में लोग सामूहिक रूप से पूजा, आरती, और भजन करते हैं, एक दूसरे के साथ मिलजुलकर उत्सव मनाते हैं। यह सामाजिक समरसता और व्यापक भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नवरात्रि का महत्व आध्यात्मिक उन्नति को बढ़ाने में भी है। व्रत रखने, पूजा-अर्चना करने, मन्त्र जप करने, और धार्मिक गानों और कथाओं का संचार करने के माध्यम से लोग अपने आंतरिक स्थिति को सुधारते हैं और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रगति करते हैं।

आयुर्वेद के ऋषियों ने भी इन दिनों में नौ तरह की औषधियों के सेवन का वर्णन किया है। साधना के ये नौ दिन विशेष तौर से हमें दीर्घायु, ऊर्जावान और बलवान बनाने वाले हों, इसके पीछे का यही उद्देश्य है। इससे तमाम प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी लाभ आपको अपने जीवन में देखने को मिल जाएंगे ।ये दिव्यगुणयुक्त औषधियां रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी बहुत सहायक हैं। इसके साथ ही यह बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वयं को ढालने में सक्षम हैं। इन नौ दिनों में विशेषकर इन नौ प्रकार की औषधियों हरड़, ब्राह्मी ,चन्दसूर, कूष्मांडा, अलसी, मोईपा या माचिका, नागदान, तुलसी एवं शतावरी का सेवन करना चाहिए । वे यह भी कहते हैं कि सिर्फ इन नौ दिन ही नहीं आगे भी जब तक सर्दी रहती है, प्राय: इन नौ औषधियों का आवश्यकता के अनुसार चिकित्सकीय परामर्श से सेवन कर सकते हैं । आप ऐसा कर तमाम प्रकार की बीमारियों से दूर रहते हैं।

जैसे कि-

(1)शैलपुत्री (हरड़) : कई प्रकार के रोगों में काम आने वाली औषधि हरड़ है जो देवी शैलपुत्री का प्रतीक रूप एक औषधि है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथया, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी आदि प्रकारक नाम से जानी जाती है ।

(2) ब्रह्मचारिणी (ब्राह्मी) : ब्राह्मी आयु व याददाश्त बढ़ाकर, रक्तविकारों को दूर कर स्वर को मधुर बनाती है। इसलिए इसे सरस्वती भी कहा जाता है।

(3) चन्द्रघण्टा (चन्दुसूर) : यह एक ऐसा पौधा है जो धनिए के समान है। यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। 

(4) कूष्माण्डा (पेठा) : इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है। इसको को पेठा भी कहते हैं। इसे श्वेत कुम्हड़ा भी कहते हैं जो रक्त विकार दूर कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिक रोगों में यह अमृत समान है। नवरात्र नवमी के दिन हवन पूजन कर उक्त श्वेत कुष्माण्ड की बली भी प्रदान की जाती है।

(5) स्कंदमाता यानी अलसी- यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर होता है। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है। अलसी का सेवन करने से कैंसर, डायबिटीज और हार्ट प्रॉब्लम आदि रोगों को दूर किया जा सकता है ।आयुर्वेदिक मत के अनुसार अलसी रक्तशोधक, दुग्धवर्द्धक, ऋतुस्राव नियामक, चर्मविकारनाशक, सूजन एवं दर्द निवारक, जलन मिटाने वाली औषधि है। यकृत, आमाशय एवं आँतों की सूजन दूर करती है। बवासीर एवं पेट विकार दूर करती है। गुदा रोगनाशक तथा गुरदे की पथरी दूर करती है। अलसी में विटामिन बी एवं कैल्शियम, मैग्नीशियम, कॉपर, लोहा, प्रोटीन, जिंक, पोटेशियम आदि खनिज लवण होते हैं। इसके तेल में 36 से 40 प्रतिशत ओमेगा-3 होता है। अलसी एनीमिया, जोड़ों के दर्द, तनाव, मोटापा घटाने में भी फायदेमंद है। इसके लिए आयुर्वेद शास्त्र में लिखित है कि  –

अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।

अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।

(6) कात्यायनी (मोइया) : देवी कात्यायनी को आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका व अम्बिका। इसके अलावा इन्हें मोइया भी कहते हैं। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।

(7) कालरात्रि (नागदौन) : यह देवी नागदौन औषधि के रूप में जानी जाती हैं। यह सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी और मन एवं मस्तिष्क के विकारों को दूर करने वाली औषधि है।

(8) देवी महागौरी – तुलसी – नवदुर्गा का आंठवा रूप महागौरी का है, जिनके औषधि का नाम तुलसी है ।सेहत के लिए यह रामबाण औषधि है। तुलसी का काढ़ा या चाय रोजाना पीने से खून साफ होता है। साथ ही इससे दिल के रोगों का खतरा भी कम होता है। यही नहीं, इससे कैंसर का खतरा भी कम होता है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है व हृदय रोग का नाश करती है। इसके लिए आयुर्वेद में श्लोक आया है –

तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।

अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि: ।

(9) नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री- इसे नारायणी या शतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल व वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार औरं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है। शतावर में एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इन्फ्लामेट्री और घुलनशील फाइबर होता है, जो पेट को दुरूस्त रखने के साथ कई रोगों से बचाने में मददगार है।शतावरी औषधि का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है, उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। कुल मिलाकर यह स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए बेहतरीन औषधि है। यह रक्त विकार को दूर करने में मदद करती है। वहीं रोजाना इसका सेवन करने से शरीर में कैंसर कोशिकाएं नहीं पनपतीं।


इस तरह पराम्बा भगवती दुर्गा देवी के शक्ति साधना के विशेष नौ दिनों में इन नौ औषधियों का सेवन करना सभी के लिए उसके शरीर के गुणधर्म के हिसाब से बहुत लाभदायक है। शक्ति स्वरूपा मां औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक करने का कार्य करती हैं । अत: मनुष्य को इन औषधियों का प्रयोग इन विशेष रूप से अपने शरीर के गुणधर्म के अनुसार, वैद्य के उचित मार्गदर्शन पर जिस मात्रा में वे बताएं, उतनी मात्रा में नियमित रूप से अवश्य ही करते रहना चाहिए। वास्तव में यह सभी जानकारी प्राप्त करने के बाद कहना होगा कि स्वस्थ बने रहने और शक्ति सम्पन्न बनने रहने के लिए माता रानी की इन नौ दिनों के अतिरिक्त भी सतत साधना से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता है।




आयुर्वेद के ऋषियों ने भी इन दिनों में नौ तरह की औषधियों के सेवन का वर्णन किया है। साधना के ये नौ दिन विशेष तौर से हमें दीर्घायु, ऊर्जावान और बलवान बनाने वाले हों, इसके पीछे का यही उद्देश्य है। इससे तमाम प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी लाभ आपको अपने जीवन में देखने को मिल जाएंगे ।ये दिव्यगुणयुक्त औषधियां रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में भी बहुत सहायक हैं। इसके साथ ही यह बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी स्वयं को ढालने में सक्षम हैं। इन नौ दिनों में विशेषकर इन नौ प्रकार की औषधियों हरड़, ब्राह्मी ,चन्दसूर, कूष्मांडा, अलसी, मोईपा या माचिका, नागदान, तुलसी एवं शतावरी का सेवन करना चाहिए । वे यह भी कहते हैं कि सिर्फ इन नौ दिन ही नहीं आगे भी जब तक सर्दी रहती है, प्राय: इन नौ औषधियों का आवश्यकता के अनुसार चिकित्सकीय परामर्श से सेवन कर सकते हैं । आप ऐसा कर तमाम प्रकार की बीमारियों से दूर रहते हैं।


   डा अमरनाथ उपाध्याय 

श्री काशी विश्वनाथ    

   मंदिर वाराणसी 

      उत्तर प्रदेश ।

    9838161474

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