तथाकथित संविधान की आड़ में जातिवाद को दिया जा रहा बढ़ावा जातीय जनगणना की श्रेय लेने की मची होड़

दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडेय की रिपोर्ट 

दुर्गावती(कैमूर)-- पहलगाम हमले का दर्द अभी ठंडा भी नहीं हुआ है, की राष्ट्र के नेतृत्वकर्ताओं द्वारा तथाकथित संविधान की आड़ में जातिवाद को दिया जा रहा बढ़ावा, जातीय जनगणना का श्रेय लेने के लिए तमाम दलों में होड़ मची हुई है, ताकि उसका लाभ उनके पार्टी को मिल सके।जब की संविधान स्पष्ट तौर पर कहता है कि लिंग आधारित,जाति आधारित, धर्म आधारित व क्षेत्र आधारित द्वेष जूर्म है, वही संविधान शब्द का अर्थ स्पष्ट तौर पर सभी के लिए सामान्य कानून हैं तो जाति आधारित कानून कैसे। एक तरफ हमारे देश के तथा कथित नेतृत्व कर्ताओं द्वारा कहा जाता है कि जातिगत आरक्षण संविधान के तहत है तो फिर वह संविधान कैसे।पहलगाम हमले पर बाहर से सरकार को समर्थन देने का संकल्प और टीवी स्क्रीन पर सरकार की कमियों को दर्शा रहे है, जिसे प्रसारण के माध्यम से दुनिया देख रहा है। इसी बीच पहलगाम हमले की चर्चा कम जातीय आधारित जनगणना की चर्चा राजनेताओं तथा उनके कार्यकर्ताओं और आकाओ के द्वारा चौक चौराहे पर हो रहे हैं। जनगणना से लाभ और हानि या भविष्य में उसके परिणाम की बात कहीं नहीं सुनने को नहीं मिल रही। विश्व जानता है कि भारत की जनता भारत के राजनेता बुद्धिजीवी है पर 99% मूर्खों की टोलियां बैठी हुई है जो समीक्षा की जगह सत्ता में बने रहने के लिए या सत्ता में आने के लिए होड़ मची है। जब आरक्षण प्राप्त कर रहे लोगों के बीच क्रिमि लेयर की बात सामने आई तो उनके ही आका आरक्षण प्राप्त करने वाले जनता को एवं यह समझाने में सफल हो गए की आरक्षण खत्म करने के लिए बातें हो रही हैं, और आरक्षण को प्राप्त करने वाले लोग एवं उससे वंचित लोग अपने स्वजाति नेताओं के समर्थन में जुट गए और उन्हें के समाज के लोग जो आरक्षण लेते थे आज भी ले रहे हैं और गरीब तबके के लोग इस वर्ग के जो जहां है वैसे ही रह गए। आज भी सच पूछा जाए तो भारत की भोली भाली जनता अपने स्वजातीय आकाओं और स्वजातीय राजनेताओं के भाषण और विचार के अलावा कुछ सुनने को तैयार नहीं है, वह जो बोलते हैं उसी को सच मान लेती है और अपने हानि लाभ से वंचित हो जाती है। संविधान में दायरे के अनुसार तमाम तरह के नियम और कानून बने हैं जिसे जनता पढ़कर वास्तविकता के विषय में जान सकती है, लेकिन जनता ऐसा नहीं करती उन्हें तो केवल अपने जातिय नेताओं के विचार और आदेश से मतलब है। संविधान भले ही कुछ कहे। सच पूछिए तो जब तक देश की जनता पूर्ण रूप से साक्षर और अध्ययन करता नहीं बन जाती तब तक उन्हें जातीय बंधन में ही रहकर जीना होगा और राजनेताओं के द्वारा बनाए गए वोट प्राप्ति के लिए मनमाने ढंग के कानून का शिकार होना होगा।

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