रामगढ़ में त्रिकोणात्मक संघर्ष जारी किले को भेदना आसान नहीं

दुर्गावती संवाददाता श्याम सुंदर पांडे 


कैमूर- जब भी रामगढ़ विधानसभा में  उपचुनाव हो या चुनाव का बिगुल बजता है तो सबकी नजर एक बार किले के रक्षक की तरफ जाती है। केंद्रीय नेता हो या बिहार के नेता एक बार रामगढ़ की पहचान के रूप में जाने जाने वाले जगतानंद की तरफ देखने को मजबूर हो जाते हैं।सहुका घराने का किले का रक्षक लंबे समय से किले पर अपना झंडा फहरा रहा है। एक बार चुनाव से अधिक बार जीतने  का इतिहास केवल इसी घराने के पास है। बिहार के किसी हिस्सों में राजपूत जाति का अगर पहचान होता है तो इसी परिवार के लोगो का नाम बताकर पहचान होती है। अगर बात करें तो जिले का निर्माण हो या मुंडेश्वरी का विकास पर्यटन स्थल, रामगढ़ का जीबी कॉलेज, रामगढ़ से होते हुए दुर्गावती तक का रोड, कल्याणपुर गांव में महिला विद्यालय की स्थापना शत्रु हरण विद्यालय की प्रगति के साथ-साथ कई ऐतिहासिक काम उनके नाम से अंकित है। इसी बीच चुनावी जंग में उनके ही हनुमान कहे जाने वाले अंबिका यादव के भतीजा पिंटू यादव उर्फ सतीश यादव के मैदान में आ जाने से यह मुकाबला काफी दिलचस्प बन गया है जो राजद और भाजपा के लिए एक चुनौती से कम नहीं है। भाजपा और राजद के प्रत्याशी उनकी चुनौती से कैसे निपटते हैं यह उनकी रणनीति पर ही तय होगा। वहीं भाजपा के प्रत्याशी अशोक कुमार सिंह अपने पांच साल में किए हुए कार्य को लेकर चुनावी मैदान में घूम रहे हैं। अशोक कुमार सिंह के पक्ष में प्रचार प्रसार के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ-साथ कई मंत्री उपमुख्यमंत्री कई नेता दिन रात प्रचार में डटे हुए है। कई बार राजनेताओं के सताओ में परिवर्तन दिलाने वाले प्रशांत भूषण भी लगातार कैंप करते नजर आ रहे हैं लेकिन ओबीसी दलित मुस्लिम कार्ड वाले फॉर्मूले पर प्रचार करते नजर आ रहे हैं। लगता है उनके मैजिक का जादू कुछ वोट के साथ सिमट जाएगा। किसी भी दल को चुनाव हारने और जीतने का असर अवश्य पड़ेगा।

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